जरुरी जानकारी | रिजर्व बैंक जलवायु परिवर्तन जोखिम को लेकर करेगा ‘समूह’ का गठन

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नयी दिल्ली, 13 मार्च भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने बृहस्पतिवार को कहा कि केंद्रीय बैंक अपने विनियामक सैंडबॉक्स पहल के तहत जलवायु परिवर्तन जोखिमों और सतत वित्त पर अलग से सदा सुलभ व्यवस्था के आधार पर समूह बनाएगा।

रिजर्व बैंक फिनटेक (वित्तीय प्रौद्योगिकी) क्षेत्र में अपने विनियामक सैंडबॉक्स और हैकाथॉन उपायों के माध्यम से नवोन्मेष को प्रोत्साहित और सुविधाजनक बना रहा है।

मल्होत्रा आरबीआई के जलवायु परिवर्तन जोखिम और वित्त नीति पर सेमिनार में कहा, ‘‘हम आरबीआई की विनियामक सैंडबॉक्स पहल के तहत जलवायु परिवर्तन जोखिमों और सतत वित्त पर अलग से ‘सदा सुलभ’ समूह (ऑन टैप कोहोर्ट) बनाने का प्रस्ताव करते हैं। हम जलवायु परिवर्तन और संबंधित पहलुओं पर एक विशेष ‘ग्रीनथॉन’ आयोजित करने की भी योजना बना रहे हैं।’’

गवर्नर ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से संबंधित जोखिमों के दो आयाम हैं, जिनके बारे में विनियामकों, नीति निर्माताओं और पेशेवरों को अवगत होना चाहिए। पहला, सुविधा प्रदान करने वाला है, जिसमें क्षमता निर्माण, परिवेश का विकास और हरित तथा सतत बदलाव का वित्तपोषण शामिल है। दूसरा विवेकपूर्ण पहलू है, जो जोखिम प्रबंधन से संबंधित है।

उन्होंने कहा, ‘‘वित्तीय प्रणाली के लिए जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न जोखिमों के प्रबंधन में केंद्रीय बैंकों की भूमिका को तेजी से पहचाना जा रहा है। हरित तथा पर्यावरण अनुकूल बदलाव के वित्तपोषण को सुविधाजनक बनाने में उनकी भूमिका बहस का विषय रही है और इसके अलग-अलग आयाम हैं।’’

विकसित अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रीय बैंकों ने पारंपरिक रूप से परिसंपत्ति-तटस्थ दृष्टिकोण का पालन किया है।

दूसरी ओर, उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रीय बैंकों ने अपने-अपने देश की परिस्थितियों और विकासात्मक उद्देश्यों को देखते हुए अपनी अर्थव्यवस्थाओं के कुछ क्षेत्रों को ऋण देने के लिए निर्देशित कर्ज नीतियों को अपनाया है।

भारत के संदर्भ में, प्राथमिक क्षेत्र को कर्ज को लेकर दिशानिर्देश नवीकरणीय ऊर्जा सहित विशिष्ट क्षेत्रों को ऋण सुलभ कराते हैं।

मल्होत्रा ने कहा, ‘‘विवेकपूर्ण पहलू पर, ऐसे कई चैनल हैं जिनके माध्यम से जलवायु परिवर्तन जोखिम वित्तीय प्रणाली को प्रभावित करते हैं। वित्तीय जोखिमों के सभी प्रमुख प्रकार... चाहे वह ऋण, बाजार या परिचालन जोखिम हो... जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होते हैं।’’

उन्होंने कहा कि एक केंद्रीय बैंक के रूप में आरबीआई जलवायु परिवर्तन से वित्तीय प्रणाली के लिए जोखिमों को संबोधित करने और कम करने में अपनी भूमिका के प्रति सजग है।

आरबीआई गवर्नर ने कहा, ‘‘इस संदर्भ में, हमारा प्रयास एक सुविधाकर्ता की भूमिका निभाने का रहा है - जिसमें क्षमता निर्माण का समर्थन करना और हरित और टिकाऊ वित्त को बढ़ावा देने के लिए एक अनुकूल नियामकीय ढांचे को बढ़ावा देना शामिल है।’’

उन्होंने कहा कि टिकाऊ वित्त के लिए हरित वित्तपोषण/कर्ज का एक महत्वपूर्ण पहलू उधारकर्ताओं द्वारा नई और उभरती हुई हरित प्रौद्योगिकियों के उपयोग के कारण उच्च ऋण जोखिम है। इसका कारण इनकी विश्वसनीयता, दक्षता और प्रभावशीलता के मामले में ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ अपेक्षाकृत सीमित है।

मल्होत्रा ने कहा कि इसलिए, विनियमित संस्थाओं (बैंक, एनबीएफसी आदि) को ऐसी हरित प्रौद्योगिकियों का उपयोग करने वाली परियोजनाओं के वित्तपोषण में जोखिमों का बेहतर मूल्यांकन करने के लिए उपयुक्त क्षमता और तकनीकी जानकारी विकसित करने की आवश्यकता है।’’

उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन जोखिमों का प्रभाव केवल वित्तीय प्रणाली तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था तक फैला हुआ है।

मल्होत्रा ने कहा, ‘‘चाहे वह कॉरपोरेट हो या एमएसएमई या कृषि क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन के जोखिम सभी पर हैं। इसके लिए न केवल वित्तीय क्षेत्र के नियामकों और विनियमित संस्थाओं बल्कि विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच भी समन्वय और सामंजस्य की आवश्यकता है।’’

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