मुंबई, पांच मई लगातार बढ़ रही मुद्रास्फीति पर काबू पाने की नीयत से भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भले ही नीतिगत ब्याज दर में अचानक वृद्धि कर दी है लेकिन वह एक सहज मौद्रिक नीतिगत कदम के पक्ष में है और दर में छोटी-छोटी बढ़ोतरी करना चाहता है।
आरबीआई के मौजूदा नीतिगत रुख से परिचित एक सूत्र ने बृहस्पतिवार को कहा कि केंद्रीय बैंक के समक्ष अचानक कदम उठाने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं रह गया था। उन्होंने कहा कि यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद मुद्रास्फीति में आई तेजी पर हाल ही में पाम तेल के निर्यात पर इंडोनेशिया के प्रतिबंध लगाने का भी असर पड़ना लाजिमी है।
सूत्र ने आरबीआई के बड़े बदलावों के बजाय छोटे-छोटे कदमों के पक्ष में बताते हुए कहा, "सोच एक सहज नीतिगत प्रतिक्रिया की है, न कि बड़े स्तर पर कदम उठाए जाएं।"
आरबीआई ने बुधवार को बिना किसी तय कार्यक्रम के अचानक ही नीतिगत रेपो दर में 0.40 फीसदी की बढ़ोतरी करने की घोषणा कर सबको चौंका दिया। केंद्रीय बैंक ने इसके लिए मुद्रास्फीति की लगातार वृद्धि को एक बड़ा कारण बताया।
यह पूछे जाने पर कि आठ अप्रैल को हुई पिछली नीतिगत समीक्षा बैठक और चार मई को दर में बढ़ोतरी करने के बीच क्या बदल गया है, सूत्र ने कहा कि मार्च में महंगाई दर का सात फीसदी रहना रिजर्व बैंक के अनुमानों से अधिक रहा और यह सिलसिला अप्रैल में भी बने रहने की आशंका थी।
कोविड महामारी के दो साल में आरबीआई ने मुद्रास्फीति के बजाय वृद्धि को अपने केंद्र में रखा था लेकिन अब उसकी प्राथमिकता बदल गई है। हालांकि रिजर्व बैंक बड़े पैमाने पर बदलाव करने के बजाय धीरे-धीरे कदम बढ़ाना चाहता है।
सूत्र ने कहा कि अगर नीतिगत ब्याज दर में तीव्र वृद्धि की गई होती तो उसका अर्थव्यवस्था पर तगड़ा असर पड़ता। क्रमिक रूप से ब्याज दर बढ़ाने से मध्यम एवं दीर्घावधि में अर्थव्यवस्था को मदद ही मिलेगी।
उसके मुताबिक, अकेले यूक्रेन युद्ध की वजह से आरबीआई को मुद्रास्फीति पूर्वानुमान में 1.20 फीसदी की वृद्धि करनी पड़ी है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) संबंधी आकलन में 0.60 फीसदी की कमी करनी पड़ी है।
सूत्र ने कहा, "जब तक लड़ाई जारी रहती है और इसके छह महीने-साल भर तक चलते रहने के आसार हैं, तब तक यही लग रहा है कि युद्ध की वजह से मुद्रास्फीति के दबाव बने रहेंगे।"
उसने कहा कि आदर्श रूप में इस वृद्धि का जून में होने वाली मौद्रिक समीक्षा बैठक से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन अगर मुद्रास्फीति काफी अधिक बनी रहती है तो उससे हालात के हिसाब से ही निपटा जाएगा।
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