विदेश की खबरें | राजपक्षे को सिंगापुर की सरकार ने ‘‘निजी यात्रा’’ के तौर पर देश में प्रवेश दिया

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सिंगापुर/कोलंबो, 14 जुलाई सिंगापुर ने बृहस्पतिवार को कहा कि उसने ''निजी यात्रा'' के लिए श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को देश में प्रवेश की अनुमति दी है और उनकी तरफ से शरण के लिए कोई अनुरोध नहीं किया गया है।

राजपक्षे, श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को संभालने में सरकार की नाकामी के खिलाफ जन विद्रोह पैदा होने के कुछ दिन बाद इस्तीफा देने के वादे के साथ देश छोड़कर मालदीव भाग गए थे।

सऊदी एयरलाइंस की उड़ान संख्या एसवी 788 (स्थानीय समयानुसार) शाम सात बजे के कुछ देर बाद सिंगापुर चांगी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरी, जिसमें राजपक्षे सवार थे।

सिंगापुर के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने मीडिया के सवालों पर प्रतिक्रिया देते हुए इस बात की पुष्टि की कि राजपक्षे को ''निजी यात्रा के लिए सिंगापुर में प्रवेश करने की अनुमति दी गई है।''

प्रवक्ता ने कहा कि न तो राजपक्षे ने शरण के लिए कोई आवेदन किया और न ही उन्हें शरण प्रदान की गई है।

राजपक्षे (73) ने बुधवार को राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने का वादा किया था। उनके देश छोड़कर चले जाने के कुछ घंटे बाद प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त कर दिया गया और इसके साथ ही देश में राजनीतिक संकट और गहरा गया तथा विरोध प्रदर्शनों का नया दौर शुरू हो गया।

शनिवार को प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति भवन पर धावा बोल दिया था, जिसके बाद राजपक्षे ने घोषणा की थी कि वह बुधवार को पद से इस्तीफा दे देंगे।

प्रदर्शनकारियों का मानना है कि देश के अभूतपूर्व आर्थिक संकट के लिए राजपक्षे जिम्मेदार हैं, जिसके चलते देश की हालत खराब हुई है।

राजपक्षे को राष्ट्रपति होने के कारण मुकदमे से सुरक्षा प्राप्त है।उन्होंने राष्ट्रपति रहते हुए देश छोड़ा ताकि सरकार द्वारा संभावित गिरफ्तारी से बचा जा सके।

संसद के अध्यक्ष महिंदा यापा अभयवर्धने ने बृहस्पतिवार को गोटबाया राजपक्षे को सूचित किया कि उन्हें जल्द से जल्द राष्ट्रपति के तौर पर अपना इस्तीफा सौंप देना चाहिए, वरना वह उन्हें पद से हटाने के लिए अन्य विकल्पों पर गौर करेंगे। मीडिया में आयी एक खबर में यह जानकारी दी गयी है कि संसद अध्यक्ष के कार्यालय को राजपक्षे का इस्तीफा मिल गया है, लेकिन अबतक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

उन्होंने कहा कि चूंकि कार्यवाहक राष्ट्रपति की नियुक्ति की गयी है तो संसद के अध्यक्ष का कार्यालय राष्ट्रपति के अपना इस्तीफा पत्र न देने पर ‘‘उनका पद खाली कराने’’ के विकल्पों पर विचार करने के लिए कानूनी प्रावधानों को तलाश रहा है।

श्रीलंकाई संसद के एक प्रवक्ता ने कहा कि राष्ट्रपति के अपना इस्तीफा पत्र न सौंपने के मद्देनजर शुक्रवार को संसद का सत्र बुलाना निश्चित नहीं है।

प्रधानमंत्री के मीडिया प्रभाग ने बुधवार को कहा कि कार्यवाहक राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने अध्यक्ष अभयवर्धने को ऐसा प्रधानमंत्री नामित करने के लिए कहा है जो सरकार तथा विपक्ष दोनों को स्वीकार्य हो।

‘डेली मिरर’ के मुताबिक श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे और पूर्व वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे ने बृहस्पतिवार को अपने वकीलों के माध्यम से उच्चतम न्यायालय को शपथपत्र दिया कि वे तब तक संकटग्रस्त देश को नहीं छोड़कर जाएंगे जब तक उनके खिलाफ दाखिल मौलिक अधिकार संबंधी याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई नहीं हो जाती।

श्रीलंकाई उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ देश में लंबे समय तक शक्तिशाली रहे राजपक्षे परिवार के दोनों सदस्यों के खिलाफ याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई कर सकती है। इस पीठ में प्रधान न्यायाधीश जयंत जयसूर्या, न्यायमूर्ति भुवनका अलुविहारे, न्यायमूर्ति प्रियंथा जयवर्धने, न्यायमूर्ति विजिथ मलालगोड और नयमूर्ति एलबीटी देहिदेनिया शामिल हैं।

राजपक्षे परिवार के सबसे वरिष्ठ सदस्य महिंदा राजपक्षे ने नौ मई को पद छोड़ दिया था। तब उनके समर्थकों ने गोटबाया राजपक्षे के कार्यालय के बाहर सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों पर हमला कर दिया था। कोलंबो में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों पर प्राणघातक हमले के मामले की जांच के मद्देनजर में श्रीलंका की अदालत ने 76 वर्षीय महिंदा राजपक्षे के देश छोड़ने पर मई में रोक लगा दी थी।

अमेरिकी पासपोर्ट धारक बासिल ने अप्रैल में ही वित्त मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उस समय ईंधन, खाद्य पदार्थों और अन्य जरूरी वस्तुओं की कमी के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गये थे। बासिल ने जून में संसद की सदस्यता भी छोड़ दी थी।

इस बीच, श्रीलंका की सेना ने बृहस्पतिवार को सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों से हिंसा से दूर रहने या नतीजों का सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा। साथ ही उसने आगाह किया कि सुरक्षा बलों को बल प्रयोग करने के लिए कानूनी अधिकार दिया गया है।

राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के देश छोड़ने के बाद बुधवार को प्रधानमंत्री कार्यालय और संसद के मुख्य मार्ग पर प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा बलों के साथ झड़प के बाद कम से कम 84 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। अवरोधकों को तोड़ने और प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश कर रही भीड़ पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे और पानी की बौछारें कीं।

पश्चिमी प्रांत में हिंसा भड़कने के बाद प्रशासन ने बुधवार को कर्फ्यू लगा दिया। सुबह कर्फ्यू हटा लिया गया। लेकिन, हिंसा की आशंकाओं के बीच इसे फिर से लागू करना पड़ा क्योंकि राष्ट्रपति राजपक्षे ने अपने इस्तीफे पर कुछ नहीं कहा है। एक दिन पहले प्रदर्शनकारियों के एक समूह द्वारा संसद के प्रवेश द्वार पर धावा बोलने के प्रयास के बाद विरोध के उग्र होने की आशंका के मद्देनजर सुरक्षा बलों ने बृहस्पतिवार को संसद के सुरक्षा घेरे को मजबूत किया।

सेना ने कहा, ‘‘उन आश्वासनों के बावजूद प्रदर्शनकारियों के एक खास समूह ने अपने घोषित अहिंसक रुख से हटकर कानून और व्यवस्था का उल्लंघन जारी रखा और संसद परिसर के साथ-साथ अध्यक्ष के आधिकारिक आवास को घेरने की कोशिश करके हिंसा का सहारा लिया।’’

सेना ने कहा कि सैन्यकर्मियों की बार बार अपील के बावजूद ‘‘उपद्रवी भीड़’’ ने जबरन संसद परिसर में दाखिल होने की कोशिश की और ड्यूटी पर तैनात जवानों पर लोहे की छड़ों, पत्थरों, हेलमेट अन्य चीजों से हमला किया जिससे कई सैनिक घायल हो गए।

विक्रमसिंघे ने एक बयान में अध्यक्ष से सर्वदलीय अंतरिम सरकार में प्रधानमंत्री बनने के लिए योग्य उम्मीदवार तलाशने को कहा है। बहरहाल, प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि अंतरिम सरकार में ऐसे नेता ही शामिल हों, जो उन्हें स्वीकार्य हैं।

प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के इस्तीफे की मांग को लेकर नौ जुलाई को राष्ट्रपति आवास और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के निजी आवास पर कब्जा जमा लिया था। बुधवार को वे प्रधानमंत्री के कार्यालय में भी घुस गए थे।

प्रदर्शनकारियों के एक समूह के प्रवक्ता ने पत्रकारों से कहा, ‘‘हम पुरानी संसद (राष्ट्रपति के कार्यालय) और गाले फेस (जहां लंबे समय से प्रदर्शन जारी हैं) के अलावा सभी इमारतों से शांतिपूर्वक हट रहे हैं। हम इन स्थानों पर बने रहेंगे, हम अपने लक्ष्यों को हासिल कर लेने तक प्रदर्शन करते रहेंगे।’’

गौरतलब है कि 2.2 करोड़ की आबादी वाला देश सात दशकों में सबसे खराब आर्थिक संकट से जूझ रहा है, जिसके कारण लोग खाद्य पदार्थ, दवा, ईंधन और अन्य जरूरी वस्तुएं खरीदने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे ने पिछले सप्ताह कहा था कि श्रीलंका अब दिवालिया हो चुका है।

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