देश की खबरें | एमबीबीएस में मानसिक दिव्यांगता से पीड़ित लोगों के लिए कोटा: न्यायालय ने समिति गठित करने को कहा
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) को निर्देश दिया है कि वह एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश में आरक्षण के संबंध में मानसिक बीमारी, विशेष शिक्षण विकार (एसएलडी) और ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार (एएसडी) से पीड़ित छात्रों की दिव्यांगता के आकलन के तरीके विकसित करने के लिए दायर याचिका की पड़ताल के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करे।
नयी दिल्ली, 22 मई उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) को निर्देश दिया है कि वह एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश में आरक्षण के संबंध में मानसिक बीमारी, विशेष शिक्षण विकार (एसएलडी) और ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार (एएसडी) से पीड़ित छात्रों की दिव्यांगता के आकलन के तरीके विकसित करने के लिए दायर याचिका की पड़ताल के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करे।
शीर्ष अदालत का निर्देश विशाल गुप्ता की याचिका पर आया, जिन्हें एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत इस आधार पर आरक्षण से वंचित कर दिया गया था कि उनकी मानसिक दिव्यांगता 55 प्रतिशत है, जो उन्हें मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने के लिए अयोग्य बनाती है।
अधिनियम के तहत, यदि प्रमाणन कार्य से जुड़ा अधिकारी प्रमाणित करता है कि किसी व्यक्ति की दिव्यांगता 40 प्रतिशत से कम नहीं है, तो उसे "मानदंड दिव्यांगता" कहा जाता है, और उस स्थिति में अभ्यर्थी को प्रवेश में आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता।
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला की पीठ ने एमबीबीएस अभ्यर्थी की ओर से पेश वकील गौरव कुमार बंसल की इन दलीलों पर ध्यान दिया कि एसएलडी और एएसडी से पीड़ित व्यक्ति के साथ इतना घिनौना व्यवहार नहीं किया जा सकता और उसे अधिनियम के तहत आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
पीठ ने एनएमसी के वकील की इस दलील पर ध्यान दिया कि स्नातक चिकित्सा शिक्षा पर संबंधित नियमों की पड़ताल के लिए एक समिति का गठन किया गया था और यह मामला अब विचार-विमर्श एवं निर्णय लेने के एक उन्नत चरण में है।
इसने उल्लेख किया कि एमबीबीएस अभ्यर्थी की शिकायत एसएलडी और एएसडी जैसी कुछ बौद्धिक अक्षमताओं वाले व्यक्तियों के संबंध में दिव्यांगता के आकलन से संबंधित है।
न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारा विचार है कि इन कार्यवाहियों में जिन पहलुओं को उठाया गया है, उन पर जानकारी रखने वाले एक विशेषज्ञ निकाय द्वारा विचार किया जाना आवश्यक है।’’
शीर्ष अदालत ने 18 मई को आदेश दिया, "इसलिए, हम राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग को इन कार्यवाही में याचिकाकर्ता की शिकायत को एक प्रतिनिधित्व के रूप में मानने और स्नातक चिकित्सा शिक्षा पर नियमों से निपटने के दौरान उचित स्तर पर शिकायत पर विचार करने का निर्देश देते हैं।"
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि अदालत को लिए जाने वाले निर्णय से अवगत कराया जाए और स्थिति रिपोर्ट दायर की जाए।
न्यायालय ने मामले में अगली सुनवाई के लिए 17 जुलाई की तारीख निर्धारित की।
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