देश की खबरें | छात्र को धर्म के आधार पर दंडित किया जाना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं : न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने मुजफ्फरनगर में एक शिक्षिका के निर्देश पर स्कूल के एक मुस्लिम छात्र को सहपाठियों द्वारा थप्पड़ मारे जाने के मामले में सोमवार को कहा कि अगर किसी छात्र को इस आधार पर दंडित किया जाता है कि वह एक विशेष समुदाय से है, तो यह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं हो सकती है।

नयी दिल्ली, 25 सितंबर उच्चतम न्यायालय ने मुजफ्फरनगर में एक शिक्षिका के निर्देश पर स्कूल के एक मुस्लिम छात्र को सहपाठियों द्वारा थप्पड़ मारे जाने के मामले में सोमवार को कहा कि अगर किसी छात्र को इस आधार पर दंडित किया जाता है कि वह एक विशेष समुदाय से है, तो यह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं हो सकती है।

न्यायालय ने इस मामले में लचर जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना करते हुए मामले को बेहद ‘‘गंभीर’’ करार दिया और उत्तर प्रदेश सरकार को मामले की जांच के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा, ‘‘शिक्षिका ने छात्रों से पीड़ित को उसके धर्म के कारण पीटने को कहा। यह कैसी शिक्षा दी जा रही है?’’

न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ ने निर्देश दिए कि भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारी शीर्ष अदालत में रिपोर्ट दाखिल करेंगे।

साथ ही उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार को पीड़ित और घटना में शामिल अन्य छात्रों की पेशेवर परामर्शदाताओं से काउंसलिंग कराने का निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुपालन में उत्तर प्रदेश सरकार की नाकामी का मामला है।

यह प्रावधान जाति,धर्म अथवा लिंग के आधार पर भेदभाव किए बिना 14 वर्ष तक के बच्चों को गुणवत्तापरक,निशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराने से जुड़ा है।

पीठ महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में मामले की त्वरित जांच कराने का अनुरोध किया गया था।

उच्चतम न्यायालय ने मुजफ्फरनगर के पुलिस अधीक्षक द्वारा दाखिल स्थिति रिपोर्ट पर गौर करते हुए कहा कि जिस तरह से काफी देरी के बाद प्राथमिकी दर्ज की गई, उस पर उसे ‘‘गंभीर आपत्ति’’ है।

इसने कहा कि पीड़ित के पिता ने स्पष्ट आरोप लगाया है कि उनके बेटे को उसकी धार्मिक आस्था के कारण स्कूल में पीटा गया था।

पीठ ने कहा, ‘‘छात्र के पिता द्वारा दी गई शिकायत संज्ञेय अपराध से संबंधित थी, लेकिन तुरंत कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई थी। शुरुआत में केवल एक गैर-संज्ञेय रिपोर्ट दर्ज की गई थी और घटना के लगभग दो सप्ताह बाद छह सितंबर को प्राथमिकी दर्ज की गई थी। प्राथमिकी में पिता की ओर से लगाए गए आरोपों का जिक्र नहीं था।’’

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि यदि आरोप सही है, तो यह किसी शिक्षक द्वारा दिया गया सबसे खराब शारीरिक दंड हो सकता है।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने कहा कि मामले में सांप्रदायिक पहलू को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है।

पीठ ने उनकी दलील से असहमति जताई और कहा कि घटना का एक वीडियो है।

पीठ ने कहा, ‘‘...यह एक बहुत ही गंभीर मुद्दा है और हम इसकी गहराई तक जाएंगे। जिस तरह से यह घटना हुई है उससे राज्य की अंतरात्मा को झटका लगना चाहिए था।’’

अदालत ने इस तथ्य पर भी आपत्ति जताई कि पीड़ित की काउंसलिंग जिला कल्याण अधिकारी द्वारा की गई थी। इसने कहा कि यह एक पेशेवर परामर्शदाता द्वारा किया जाना चाहिए था और घटना में शामिल सभी छात्रों की काउंसलिंग कराई जानी चाहिए।

पीठ ने नटराज को एक रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए कहा, ‘‘पीड़ित समेत सभी छात्रों की काउंसिलिंग विशेषज्ञों द्वारा की जानी है। इस मामले की जांच किसी वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी से करायी जानी चाहिए। हम यह भी जानना चाहते हैं कि आरोपपत्र कब दाखिल किया जाएगा और गवाहों और पीड़ित को क्या सुरक्षा दी गई है।’’

पीठ ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा जांच के लिए नियुक्त किए जाने वाले आईपीएस अधिकारी को इस सवाल पर भी गौर करना चाहिए कि क्या आईपीसी की धारा 153ए (धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) को भी जोड़ा जाना चाहिए।

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