समुद्री पक्षियों का जीवन तबाह कर रहे घरों से निकले प्रदूषक

पारा और फॉरएवर केमिकलों (पीएफएएस) के कारण समुद्री पक्षी शीयरवॉटर के शरीर में ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया प्रभावित हुई है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

पारा और फॉरएवर केमिकलों (पीएफएएस) के कारण समुद्री पक्षी शीयरवॉटर के शरीर में ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया प्रभावित हुई है. यह केमिकल माइटोकॉन्ड्रिया को प्रभावित करते हैं जिन्हें कोशिका का 'पावरहाउस' भी कहा जाता है.एक नई रिसर्च से पता चला है पानी में पाए जाने वाले आम प्रदूषक समुद्री पक्षियों में ऊर्जा उत्पादन को बाधित कर रहे हैं, जिससे उनकी सेहत बुरी तरह प्रभावित हो सकती है. जर्मनी के माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस के वैज्ञानिकों का यह अध्ययन, इटली के एक छोटे और दूरदराज ज्वालामुखी द्वीप लिनोसा पर प्रजनन करने वाले स्कोपोली शीयरवॉटर पक्षियों पर केंद्रित था.

वैज्ञानिकों ने पाया कि मरकरी (पारा) और कुछ खास पीएफएएस कंपाउंड (पर एंड पॉलीफ्लूरोएल्कायल सब्सटांस) जैसे व्यापक प्रदूषक माइटोकॉन्ड्रिया के काम को प्रभावित करते हैं. माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावरहाउस कहा जाता है. उड़ने से लेकर प्रजनन तक, शरीर की जरूरतों के लिए ज्यादातर ऊर्जा यहीं पैदा होती है.

शीर्ष शिकारियों को ज्यादा खतरा

समुद्रों में बैक्टीरिया मरकरी को अक्सर ज्यादा खतरनाक मिथाइलमरकरी में बदल देते हैं, जो ऊतकों में जमा हो जाता है. इस तरह छोटे जीव से छोटे शिकारी और फिर बड़े शिकारी के शरीर में जाता है. यानी खाद्य शृंखला के शीर्ष शिकारियों में इसका स्तर सबसे अधिक होता है.

पीएफएएस को "फॉरएवर केमिकल्स" यानी कभी ना खत्म होने वाले केमिकल कहा जाता है. यह नॉन-स्टिक बर्तन और दाग-प्रतिरोधी कपड़ों जैसे सामानों में पाए जाते हैं. इनके इस्तेमाल को नियंत्रित करने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बावजूद वे बड़ी संख्या में जमा हो रहे हैं. लैब के अध्ययनों ने दिखाया है कि पीएफएएस माइटोकॉन्ड्रिया में ऊर्जा उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं. वन्यजीवों पर इनके प्रभाव की अब तक जानकारी नहीं थी.

मरकरी और पीएफएएस का असर

वैज्ञानिक श्टेफानिया कासाग्रांडे के नेतृत्व में रिसर्चरों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने 'स्कोपोली शीयरवॉटर' पक्षी में प्रदूषक स्तर और माइटोकॉन्ड्रियल फंक्शन- दोनों को मापा.

माइटोकॉन्ड्रिया एक इलेक्ट्रिक चार्ज बनाते हैं जो एडेनोसीन ट्राइफॉस्फेट (एटीपी) के उत्पादन को संचालित करता है. यह कोशिका की एनर्जी करेंसी है. आम भाषा में समझें तो चाहे उड़ान भरनी हो या शिकार करना हो, काम करने के लिए उन्हें एटीपी खर्च करने होंगे. जिन पक्षियों में मरकरी की मात्रा ज्यादा हो जाती है, उनमें माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली में ज्यादा छेद हो जाते हैं. इससे एटीपी पैदा किए बिना ज्यादा ऊर्जा नष्ट हो जाती है. कुछ-कुछ वैसा ही जैसे मानो पानी, पनबिजली बांध के टरबाइनों को बिना छुए निकल जाए है.

वहीं कुछ पीएफएएस के उच्च स्तर का उल्टा असर पड़ता है. वे झिल्लियों को सख्त बना देते हैं और ऊर्जा के रिसाव कम कर देते हैं. लेकिन इससे उस सुरक्षा वाल्व को नुकसान होता है जो हानिकारक अणुओं के निर्माण को रोकता है. हानिकारक अणु बढ़ते हैं तो सेल को नुकसान होता है.

आहार और कोशिकाओं को होने वाला नुकसान

शीयरवॉटर की उम्र 20 से 30 साल के बीच हो सकती है. यानी समय के साथ वे प्रदूषकों को जमा करते हैं, और एक तरह से समुद्र के स्वास्थ्य के संकेतक बन जाते हैं.

रिसर्चरों ने दो सीजनों में प्रजनन करने वाले 52 वयस्कों के सैंपल लिए, सभी पक्षियों में मरकरी और माइटोकॉन्ड्रियल फंक्शन को मापा गया. वहीं, एक सीजन के 20 पक्षियों में पीएफएएस का विश्लेषण किया गया.

जांच में ज्यादा उम्र के नर पक्षियों में मरकरी का स्तर अधिक था. मादाओं के मामले में अंडे देने के साथ मरकरी शरीर से बाहर निकल आता है, इसलिए स्तर थोड़ा कम दर्ज किया गया. वहीं पीएफएएस ने उम्र, लिंग या आहार के साथ ऐसा कोई संबंध नहीं दिखाया. यानी मरकरी की तुलना में पीएफएएस का शीयरवॉटर पक्षी के शरीर में पहुंचने का जरिया कुछ और रहा.

प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के खतरे

गीसन यूनिवर्सिटी की छात्रा और रिसर्च पेपर की प्रथम सह-लेखिका लूसी मिशेल कहती हैं रासायनिक प्रदूषण अपनी अदृश्य प्रकृति और अलग-अलग प्रभावों के कारण सभी स्तरों पर समुद्री इकोसिस्टम के लिए काफी जटिल खतरों में से हैं. उन्होंने कहा कि वन्यजीवों के लिए अन्य खतरों जैसे कि अत्यधिक मछली पकड़ने, प्लास्टिक प्रदूषण और ग्लोबल वॉर्मिंग के संदर्भ में इन प्रभावों को समझना भी जरूरी है. इन सवालों के जवाब देने के लिए लंबी अवधि की निगरानी चाहिए होगी. इनका मानव स्वास्थ्य पर मरकरी और पीएफएएस के प्रभावों को समझने के लिए भी महत्व है, क्योंकि हम भी इसी तरह के जोखिमों का सामना करते हैं.

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