कोविड-19 से मुकाबले के लिए प्लाज्मा थेरेपी कोई ‘जादू की छड़ी’ नहीं है: विशेषज्ञ

कई राज्य कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार लोगों के इलाज के लिए इस थेरेपी के उपयोग पर विचार कर रहे हैं।

जमात

नयी दिल्ली, चार मई शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञों ने सोमवार को कहा कि प्लाज्मा थेरेपी कोरोना वायरस से निपटने के लिए कोई ‘‘जादू की छड़ी’’ नहीं है और केवल बड़े पैमाने पर नियंत्रित परीक्षण से उपचार की दृष्टि से इसके प्रभाव का पता चल सकता है।

कई राज्य कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार लोगों के इलाज के लिए इस थेरेपी के उपयोग पर विचार कर रहे हैं।

इस थेरेपी के तहत कोविड-19 संक्रमण से स्वस्थ हुए एक व्यक्ति के खून से एंटीबॉडी लिये जाते है और उन एंटीबॉडी को कोरोना वायरस से ग्रस्त मरीज में चढ़ाया जाता है ताकि संक्रमण से मुकाबला करने में उसकी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सके।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले सप्ताह इसके इस्तेमाल को लेकर चेताते हुए कहा था कि कोरोना वायरस के मरीज के इलाज के वास्ते प्लाज्मा थेरेपी अभी प्रायोगिक चरण में है।

हालांकि राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र और दिल्ली समेत कुछ राज्य सरकारों ने प्लाज्मा थेरेपी से इलाज के लिए अपनी इच्छा जताई थी और केन्द्र ने कोविड-19 के मरीजों की सीमित संख्या में प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल करने की कुछ राज्यों को अनुमति दी थी।

शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इसे इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि यह कोविड-19 के इलाज में कोई ‘‘बड़ा अंतर’’ पैदा कर सकता है और इस थेरेपी के नियंत्रित ट्रायल से इसके प्रभाव साबित हो सकते है।

दिल्ली में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने कहा कि जहां तक कोरोना वायरस का संबंध है, बहुत कम प्लाज्मा थेरेपी के ट्रायल हुए हैं, और केवल कुछ रोगियों में ही इसके कुछ लाभ देखने को मिले हैं।

गुलेरिया ने ‘पीटीआई-’ से कहा, ‘‘यह केवल उपचार योजना का एक हिस्सा है। इसे व्यक्ति को अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर करने में मदद मिलती है क्योंकि प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडी खून में जाते है और इस वायरस से मुकाबला करने में मदद करने का प्रयास करते है। यह कुछ ऐसा नहीं है, जो नाटकीय बदलाव ला देगा।’’

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, लेटेस्टली स्टाफ ने इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया है)

Share Now

\