नयी दिल्ली, दो अगस्त मणिपुर मुद्दे पर चर्चा को लेकर अपने नोटिस के स्वीकार नहीं किए जाने के विरोध में बुधवार को विपक्षी सदस्यों ने राज्यसभा से बहिर्गमन किया। वहीं सभापति जगदीप धनखड़ ने इस बात पर अफसोस जताया कि एक बार व्यवस्था दिए जाने के बाद भी उसी मुद्दे पर बार-बार नोटिए दिए जा रहे हैं।
विपक्षी सदस्यों ने सूचीबद्ध कामकाज को स्थगित कर मणिपुर मुद्दे पर चर्चा शुरू करने के लिए नोटिस दिए थे। मानसून सत्र के शुरू होने के बाद से ही विपक्षी सदस्य मणिपुर मुद्दे पर नियम 267 के तहत चर्चा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान की मांग कर रहे हैं।
उच्च सदन की सुबह बैठक शुरू होने पर सभापति जगदीप धनखड़ ने आवश्यक दस्तावेज सदन के पटल पर रखवाए। इसके बाद उन्होंने कहा कि उन्हें मणिपुर की स्थिति पर चर्चा के लिए नियम 267 के तहत 58 नोटिस मिले हैं। उन्होंने कहा कि ये सभी नोटिस मणिपुर की स्थिति से जुड़े हैं।
सभापति ने कहा कि मणिपुर मुद्दे पर चर्चा के लिए उन्होंने पहले ही व्यवस्था दी थी और सरकार भी चर्चा के लिए तैयार थी। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर चर्चा को सूचीबद्ध भी किया गया लेकिन दुर्भाग्य से चर्चा नहीं हो सकी।
सभापति ने कहा कि मीडिया के एक हिस्से में ऐसी धारणा है कि नियम 176 के तहत उन्होंने ढाई घंटे का समय तय किया था लेकिन सदस्य इस बात से अवगत होंगे कि उन्होंने संकेत दिया था कि चर्चा के लिए कोई समय सीमा नहीं है ताकि सदन के सभी वर्ग अपनी बात रख सकें।
उन्होंने कहा कि मीडिया के एक हिस्से में जो धारणा बनाई गई है, वह वस्तुत: सही नहीं है।
इसके बाद, धनखड़ ने आज मिले नोटिस का जिक्र किया और कहा कि उन्होंने सत्र के पहले दिन ही यानी 20 जुलाई को इसी मुद्दे पर नियम 176 के तहत चर्चा की मांग को स्वीकार कर लिया था।
उन्होंने कहा कि एक बार इस मुद्दे पर आसन द्वारा व्यवस्था दिए जाने के बाद भी प्रतिदिन उसी मुद्दे पर कई नोटिस मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह यह विषय सदस्यों के विवेक और आत्मचिंतन पर छोड़ते हैं कि एक बार व्यवस्था दिए जाने के बाद भी क्या यह रुख उचित है।
इसके बाद सभापति ने आज मिले नोटिस को अस्वीकार किए जाने की घोषणा की। अपने नोटिस स्वीकार नहीं किए जाने के बाद विपक्षी सदस्यों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
हंगामे के बीच ही कई विपक्षी सदस्यों ने नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को बोलने का मौका दिए जाने की मांग की। इस पर सभापति ने आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी सदस्य को यह मांग करने की जरूरत नहीं है और यह मांग नेता प्रतिपक्ष के कद एवं आसन के प्रति अन्याय है।
आसन से अनुमति मिलने के बाद खरगे ने कहा कि उन्होंने नियम 267 के तहत एक नोटिस दिया है और उसमें आठ बिंदुओं के जरिए स्पष्ट किया है कि क्यों मणिपुर मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए और क्यों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सदन में आकर बयान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि मणिपुर में हिंसा के कारण करीब 200 लोगों की मौत हुई है और करीब 500 लोग घायल हुए हैं।
सभापति ने इसके बाद खरगे को रोकते हुए कहा कि उन्होंने नेता प्रतिपक्ष को अपनी बात कहने का मौका दिया लेकिन उन्होंने उसका सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया।
उन्होंने कहा कि आसन यहां से प्रधानमंत्री को कोई निर्देश नहीं दे सकता और कभी भी आसन ने प्रधानमंत्री को सदन में आने का निर्देश नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि अगर वह ऐसा करते हैं तो यह संविधान के तहत शपथ का उल्लंघन होगा।
विपक्षी सदस्यों के हंगामे के बीच ही सभापति ने शून्यकाल शुरू कराया और इसी दौरान विपक्षी सदस्य सदन से बहिर्गमन कर गये। इसके बाद उच्च सदन में शून्यकाल और प्रश्नकाल सामान्य ढंग से चला।
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