देश की खबरें | नंदीग्राम का संग्राम: ममता और अधिकारी के ताल ठोकने से गर्मायी बंगाल की राजनीति
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. नंदीग्राम की जमीन ने पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी के पांव जमाने में अहम भूमिका निभाई और यहां शुरू हुए आंदोलन से ही उन्होंने सड़कों से सत्ता तक का सफर तय किया। राज्य में लगातार तीसरी बार अपनी सरकार बनाने के लिये ममता ने एक बार फिर नंदीग्राम की राह पकड़ी है।
नंदीग्राम (प.बंगाल), 20 जनवरी नंदीग्राम की जमीन ने पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी के पांव जमाने में अहम भूमिका निभाई और यहां शुरू हुए आंदोलन से ही उन्होंने सड़कों से सत्ता तक का सफर तय किया। राज्य में लगातार तीसरी बार अपनी सरकार बनाने के लिये ममता ने एक बार फिर नंदीग्राम की राह पकड़ी है।
भूमि-अधिग्रहण के खिलाफ करीब एक दशक पहले यहां ‘तोमर नाम, अमार नाम…नंदीग्राम, नंदीग्राम’ के नारे जहां हर तरफ सुनाई व लिखे दिखते थे, वहां की दीवारों पर अब ‘जय श्री राम’ भी प्रमुखता से लिखा नजर आ रहा है।
नंदीग्राम के आंदोलन में ममता बनर्जी की जुझारू जन नेता की छवि को पश्चिम बंगाल की जनता ने पसंद किया और वह इस राज्य में वामपंथ के मजबूत किले को भेदने में कामयाब हुईं।
इस बार हालांकि उनका सामना नंदीग्राम आंदोलन में उनके सिपहसालार रहे शुभेंदु अधिकारी से है जो अब पाला बदलकर भाजपा में जा चुके हैं। अधिकारी ने घोषणा की है कि वह अपने गृह क्षेत्र में ममता को हराने में नाकाम रहे तो सियासत छोड़ देंगे।
आम तौर पर ग्रामीण और शहरी पश्चिम बंगाल की विशेषताओं को अपने में समेटे सामान्य कृषि क्षेत्र नजर आने वाले इस इलाके को भू-अधिग्रहण विरोधी संघर्ष ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों ने ला दिया था। विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं एक बार फिर यहां संघर्ष का खतरा मंडराने लगा है जिससे नंदीग्राम की शांति भंग होने का अंदेशा है।
औद्योगीकरण के लिये सरकारी भूमि अधिग्रहण के खिलाफ कभी काफी हद तक एक जुट होकर सबसे खूनी संघर्ष का गवाह बना नंदीग्राम आज सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत नजर आता है।
प्रदेश में तत्कालीन वामपंथी सरकार द्वारा यहां विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) बनाने के लिये भूमि अधिग्रहण के खिलाफ 2007 में हर तरफ सुनाई देने वाले नारे ‘तोमर नाम, अमार नाम…नंदीग्राम, नंदीग्राम’ (तुम्हारा नाम, मेरा नाम नंदीग्राम, नंदीग्राम) से यह इलाका अब काफी आगे निकल आया है। यह नारा तब जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जनता की राय को सामाजिक और राजनीतिक रूप से आत्मसात कर एक सुर में उस फैसले के विरोध का प्रतीक बन गया था।
आज नंदीग्राम की दीवारों पर धुंधले दिखाई देते “तोमार नाम अमार नाम, नंदीग्राम, नंदीग्राम” के साथ “जय श्री राम” का नारा प्रमुखता से दिखता है।
इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की सबसे बड़ी वजह क्षेत्र के कद्दावर नेता और तृणमूल कांग्रेस में अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके शुभेंदु अधिकारी का भाजपा में शामिल होना और फिर ममता बनर्जी का अचानक यहां से चुनाव लड़ने की घोषणा करना है।
बनर्जी द्वारा सोमवार को की गई घोषणा का पूरे पूर्वी मिदनापूर्व जिले में असर होगा।
बनर्जी और अधिकारी दोनों ही नंदीग्राम आंदोलन के नायक रहे हैं। टीएमसी सुप्रीमों पथ प्रदर्शक के तौर पर रहीं तो अधिकारी जमीनी स्तर पर उनके सिपहसालार रहे जो एसईजेड के खिलाफ जन रैलियों का आयोजन करते थे। इस एसईजेड में इंडोनेशिया के सलीम समूह द्वारा रसायनिक केंद्र स्थापित किया जाना था।
टीएमसी के लोकसभा सदस्य और अधिकारी के पिता शिशिर तब भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति (बीयूपीसी) के संयोजक थे। इस समिति में विभिन्न राजनीतिक विचारधारा के लोग शामिल थे। टीएमसी, कांग्रेस, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और यहां तक की वाम दलों के असंतुष्ट सदस्यों ने भी सरकार के साथ एकजुट होकर यह संघर्ष किया।
पश्चिम बंगाल की सियासत में वामदलों और कांग्रेस के हाशिये पर जाने के बाद नंदीग्राम में बनर्जी की टीएमसी और भाजपा के बीच एक कड़ी व कड़वाहट भरी सियासी जंग के आसार बन रहे हैं।
विरोधी दलों की रैलियों पर हमले हो रहे हैं, लोग जख्मी हो रहे हैं।
बीयूपीसी के संघर्ष के बाद इस क्षेत्र में कोई उद्योग नहीं आया और नंदीग्राम की अर्थव्यवस्था का मुख्य रूप से कृषि उत्पादों, चावल व सब्जियों और आसपास के इलाकों में ताजा मछली की आपूर्ति पर टिकी है।
नंदीग्राम में 2007-11 के बीच संघर्ष से यहां की शांति भंग हुई जब बूयीपीसी और माकपा समर्थकों के बीच हुई झड़प में कई लोग मारे गए लेकिन इसके बावजूद इलाके में कभी धार्मिक या सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण नहीं हुआ और मतभेद पूरी तरह राजनीतिक ही थे।
भू-अधिग्रहण विरोधी आंदोलन में हिस्सा ले चुके स्थानीय निवासी रसूल काजी ने ‘पीटीआई-’ को बताया, “बीते छह-सात सालों में नंदीग्राम काफी बदल गया है। पहले सभी समुदाय यहां मिलजुल कर शांति से रहते थे। मतभेद और हिंसा पहले भी होती थी लेकिन वे धार्मिक नहीं राजनीति आधारित होती थीं। अब यह धर्म से उपजती है जहां एक तरफ बहुसंख्य हिंदू होते हैं तो दूसरी तरफ मुसलमान। हमनें पहले कभी यहां ऐसी स्थिति नहीं देखी।”
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