देश की खबरें | मुर्मू को पद की गरिमा और संविधान की कसौटी पर खरा उतरना होगा: संजय कुमार

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सत्ता में रहते हुए 2002 में प्रख्यात वैज्ञानिक ए पी जे अब्दुल कलाम को और 2017 में दलित नेता रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था और अब 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में उसने झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाया है। अपने इस फैसले को वह पहली बार आदिवासी समुदाय से किसी को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बिठाने के रूप में पेश और प्रचारित कर रही है। इसके राजनीतिक निहितार्थों पर ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार से ‘‘भाषा के पांच सवाल’’ और उनके जवाब:-

नयी दिल्ली, 26 जून भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सत्ता में रहते हुए 2002 में प्रख्यात वैज्ञानिक ए पी जे अब्दुल कलाम को और 2017 में दलित नेता रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था और अब 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में उसने झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाया है। अपने इस फैसले को वह पहली बार आदिवासी समुदाय से किसी को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बिठाने के रूप में पेश और प्रचारित कर रही है। इसके राजनीतिक निहितार्थों पर ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार से ‘‘ के पांच सवाल’’ और उनके जवाब:-

सवाल: पहली बार मौका मिला तो भाजपा ने एक मुस्लिम और दूसरी बार एक दलित को राष्ट्रपति बनाया। इस बार उसने एक आदिवासी प्रत्याशी पर दांव चला है। क्या लक्ष्य और क्या संदेश दिखता है आपको?

जवाब: यह सही है कि 2002 के गोधरा दंगों के बाद भाजपा ने कलाम साहब को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया और जब रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाया गया तब दलितों के खिलाफ अत्याचार के आरोप लग रहे थे। लेकिन इस बार ऐसा कोई आरोप नहीं दिखाई दे रहा है कि आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार के मामलों में तेजी आई है। कोविंद के बाद अब मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर वे एक व्यापक संदेश देना चाहते हैं कि भाजपा के शासन में समाज के पिछड़े तबकों की अनदेखी नहीं होती। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह अब अगड़ी जातियों की पार्टी नहीं है।

पिछली बार मंत्रिपरिषद का विस्तार हुआ था तब सभी ने देखा कि कितना प्रचार किया गया कि इसमें इतने दलित, आदिवासी, महिलाएं और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। तो भाजपा एक संदेश देना चाहती है कि यह अब वो भाजपा नहीं है जिस पर विभिन्न प्रकार के आरोप लगते थे। संदेश साफ है कि भाजपा समाज के हर वर्ग की पार्टी है, जो ना सिर्फ ‘‘सबका साथ और सबका विकास’’ की बात करती है बल्कि वह दलितों और आदिवासियों को भी शीर्ष संवैधानिक पदों पर बिठाती है और उनका सम्मान करती है।

सवाल: द्रौपदी मुर्मू यदि राष्ट्रपति बनती हैं तो क्या भविष्य के चुनावों में भाजपा को आदिवासी समुदाय का समर्थन मिलेगा?

जवाब: पिछले कुछ चुनावों में देखें तो भाजपा को आदिवासियों का समर्थन मिलता रहा है। इस वोट बैंक पर कांग्रेस और कुछ क्षेत्रीय दलों का एकाधिपत्य रहा करता था। आज कांग्रेस तो इस परिदृश्य में कहीं नहीं दिखती (कांग्रेस शासित आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ को छोड़कर) लेकिन आदिवासी वोट बैंक पर कुछ क्षेत्रीय दलों की मजबूत पकड़ बरकरार है। इसलिए, भाजपा ने यद कदम उठाया है। ताकि आगामी चुनावों में आदिवासियों के वोट को और सहेजा जा सके और कुछ क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को चुनौती दी जा सके, खासकर आदिवासी बहुल राज्यों में। द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने से भाजपा को इतना फायदा जरूर मिलेगा कि उसका आदिवासी वोट बैंक अब खिसकेगा नहीं, बल्कि वह बढ़ेगा ही।

सवाल: कलाम को राष्ट्रपति बनाकर भाजपा आजतक मुस्लिम समुदाय को साध नहीं सकी है। क्या रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने से दलितों के बीच उसकी पैठ बढ़ी है?

जवाब: यह बात सही है कि कलाम साहब को राष्ट्रपति बनाकर भी भाजपा मुसलमानों का विश्वास नहीं जीत सकी। कलाम साहब का व्यक्तित्व और उनका आभामंडल उन्हें धर्म और जाति से परे रखता था। लेकिन यह कहना कि रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाने से दलितों के बीच भाजपा की पैठ बढ़ी है, उचित नहीं होगा। यह सही है कि पिछले कुछ सालों में दलितों के बीच भाजपा की पैठ बढ़ी है लेकिन इसके कई कारक हैं। इनमें केंद्र सरकार की योजनाएं और दलितों को केंद्र में रखकर उठाए गए उसके कुछ कदम शामिल हैं। हां, दलितों के बीच भाजपा की जो पैठ बढ़ी है, उसमें एक कारक कोविंद को राष्ट्रपति बनाया जाना भी है।

सवाल: देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठने वाले व्यक्ति को जाति और धर्म की कसौटी पर तौलने को कितना जायज मानते हैं आप?

जवाब: यह बिल्कुल जायज नहीं है। क्योंकि राष्ट्रपति का पद देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद होता है। उस पर बैठा व्यक्ति किसी जाति, धर्म या राजनीतिक दल का नहीं होता है। मुझे तो इसी बात पर आपत्ति है कि जब भाजपा की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में द्रौपदी मुर्मू या रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा की गई तो उनका परिचय आदिवासी और दलित के रूप में कराया गया। इससे परहेज किया जाना चाहिए था। उनकी खूबियों, उपलब्धियों और विशेषताओं को उनकी पहचान के रूप में प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी। लेकिन यह भी सत्य है कि उम्मीदवार की घोषणा के साथ ही राजनीतिक नजरिए से उस फैसले के नफा-नुकसान को तौला जाने लगता है और फिर उसके विमर्श के केंद्र में उम्मीदवार की जाति और उसका धर्म आ जाता है। इससे बचना चाहिए।

सवाल: संविधान राष्ट्रपति की कल्पना ऐसे व्यक्ति के रूप में करता है, जो सत्ता के खेल का हिस्सा ना बने, तटस्थता से राष्ट्र-प्रमुख की भूमिका निभाए। इस पैमाने पर भाजपा की पसंद को आप कैसे पाते है?

जवाब: आपने बिल्कुल सही कहा। जो भी व्यक्ति इस सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठता है, उससे यही अपेक्षा भी की जाती है। देश के कुछ राष्ट्रपतियों ने इसका अनुसरण भी किया लेकिन कुछ राष्ट्रपतियों का कार्यकाल ऐसा भी रहा जिनके लिए ‘‘रबर स्टांप’’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया। ऐसा इसलिए था क्योंकि उन्होंने सरकार के अनुसार फैसलों पर सहमति दी और संविधान की गरिमा को नजरअंदाज किया जबकि उनसे उम्मीद की जाती है कि वह दलगत भावना से ऊपर उठकर फैसले लेंगे।

लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि राष्ट्रपति अपने आप में एक पद है। और उस पर व्यक्ति विराजमान होता है। उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह ‘‘रबर स्टांप’’ बने या संवैधानिक कर्तव्यों के अनुरूप फैसले ले और जरूरत पड़े तो सरकार को उसकी कमियों व गलतियों का एहसास कराए। द्रौपदी मुर्मू अगर राष्ट्रपति बनती हैं, जिसकी संभावना बहुत है तो उन्हें पद की गरिमा और संविधान की कसौटी पर खरा उतरना होगा। यही उनके लिए चुनौती होगी।

ब्रजेन्द्र

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