देश की खबरें | महाराष्ट्र सरकार का सड़क सुरक्षा कोष 823 करोड़ रुपये है लेकिन वास्तविक खर्च सिर्फ 65 करोड़ रुपये है: आंकड़े

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. महाराष्ट्र सरकार ने 2016 से वित्तवर्ष 23 के अंत तक सड़क सुरक्षा निधि के रूप में 823 करोड़ रुपये जुटाए, लेकिन 2016 से 2022 के बीच सड़क दुर्घटनाओं में 91,000 से अधिक लोगों की मौत होने के बावजूद सुरक्षा पहल पर महज 65 करोड़ रुपये खर्च किए। आकड़ों में यह जानकारी दी गई है।

मुंबई, चार जून महाराष्ट्र सरकार ने 2016 से वित्तवर्ष 23 के अंत तक सड़क सुरक्षा निधि के रूप में 823 करोड़ रुपये जुटाए, लेकिन 2016 से 2022 के बीच सड़क दुर्घटनाओं में 91,000 से अधिक लोगों की मौत होने के बावजूद सुरक्षा पहल पर महज 65 करोड़ रुपये खर्च किए। आकड़ों में यह जानकारी दी गई है।

आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, अब तक सड़क सुरक्षा कोष (आरएसएफ) को मिली धनराशि का इस्तेमाल मुख्य रूप से ‘इंटरसेप्टर’ वाहन और कुछ उपकरण जैसे श्वांस विश्लेषक और ‘स्पीड गन’ खरीदने के लिए किया गया।

महाराष्ट्र सरकार ने सड़क सुरक्षा को लेकर उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति के दिशानिर्देशों के आधार पर आरएसएफ की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य वाहन खरीद के समय उपकर लगाकर कोष एकत्रित करना था। सरकार ने सितंबर 2016 में कोष की निगरानी के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की थी।

इनके अनुसार महाराष्ट्र में 2016 से 2022 के बीच 2,31,906 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 91,228 लोगों की मौत हुई। पिछले साल राज्य में सड़क दुर्घटनाओं में 14,883 लोगों की मौत हुई। इनमें वह दुर्घटना भी शामिल है, जिसमें टाटा संस के पूर्व चेयरमेन सायरस मिस्री की मौत हो गई थी। इस दुर्घटना के बाद सुरक्षा के मोर्चे पर व्याप्त खामियां बाहर आ गई थीं।

आंकड़ों के अनुसार मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति ने विभिन्न विभागों के 820.04 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, लेकिन अधिकांश परियोजनाएं अभी शुरू नहीं हुई हैं।

परिवहन विभाग ने आरएसएफ कोष में से कम धनराशि खर्च होने के लिए कोरोना वायरस महामारी को जिम्मेदार बताया।

महाराष्ट्र के परिवहन आयुक्त विवेक भीमनवार ने कहा, "हमें इसके (कोष) के माध्यम से विभिन्न परियोजनाएं शुरू करनी है, विशेष रूप से स्वचालित परीक्षण केंद्र और स्वचालित ड्राइविंग ट्रैक। कोविड के कारण इसकी निविदा प्रक्रिया बंद कर दी गई थी। कोविड के बाद निविदा प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन बोली से पहले आरएफपी के बारे में कुछ सुझाव और आपत्तियां थीं, जिसके कारण 4-6 महीने बर्बाद हो गए।”

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