देश की खबरें | प्रथमदृष्टया संलिप्तता नजर आने पर मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को समन कर सकते हैं जिसका नाम पुलिस रिपोर्ट में नहीं है: न्यायालय

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नयी दिल्ली, 16 मार्च उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि अगर किसी मामले में पहली नजर में मजिस्ट्रेट को किसी की संलिप्तता नजर आती है तो वह अपने अधिकार का इस्तेमाल करके उसे समन जारी कर सकता है, भले ही उसका नाम पुलिस रिपोर्ट में एक आरोपी सहित किसी रूप में नहीं है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि मजिस्ट्रेट के समक्ष उन व्यक्तियों के अलावा भी ऐसी किसी व्यक्ति की मिलीभगत को दर्शाने वाली सामग्री है, जिन्हें आरोपी के रूप में पेश किया गया है या पुलिस रिपोर्ट के कॉलम दो में नामित किया गया है तो मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को अपराध का संज्ञान लेते हुए समन कर सकते हैं।

न्यायमूर्ति विनीत सरन और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की एक पीठ ने एक अपील पर अपना फैसला सुनाया जिसमें एक सवाल - कि क्या पुलिस रिपोर्ट के आधार पर अपराध का संज्ञान लेने वाला मजिस्ट्रेट किसी ऐसे व्यक्ति को समन जारी कर सकता है जिस पर आरोप नहीं लगाया गया है और जिसका नाम कॉलम दो में भी नहीं है - विचार के लिए आया था।

पीठ ने कहा, ‘‘हम पहले ही अपनी राय व्यक्त कर चुके हैं कि समन जारी करने के लिए इस तरह के अधिकार क्षेत्र का प्रयोग उस व्यक्ति के संबंध में भी किया जा सकता है जिसका नाम पुलिस रिपोर्ट में भी नहीं हो, एक आरोपी के रूप में या उसके कॉलम (2) में, यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट है कि रिकॉर्ड पर ऐसी सामग्री है जो प्रथम दृष्टया अपराध में उसकी संलिप्तता को प्रकट करेगी।’’

पीठ ने शीर्ष अदालत द्वारा पूर्व के कई निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि कोई भी प्राधिकारी को संज्ञान लेने पर किसी आरोपी को समन करने में मजिस्ट्रेट या सत्र अदालत की शक्ति या अधिकार क्षेत्र को सीमित या प्रतिबंधित नहीं करता है, जिसका नाम प्राथमिकी या पुलिस रिपोर्ट में शामिल नहीं हो।

शीर्ष अदालत ने 2015 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया।

पीठ ने कहा कि उसके समक्ष अपीलकर्ता का नाम मामले में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) में नहीं था।

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) ने उस पुलिस रिपोर्ट के आधार पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत अपराधों का संज्ञान लिया था, जिसमें धारा 376 शामिल था, जिसमें दो व्यक्तियों को मामले में आरोपी के रूप में नामित किया गया था।

प्राथमिकी पीड़िता की मां की शिकायत पर दर्ज की गई थी, जिसने कहा था कि मई 2012 में, उसकी बेटी को आरोपियों में से एक और उसके दो या तीन सहयोगियों ने बहकाया था।

बाद में, पीड़िता का बयान सीआरपीसी की धारा 164 के तहत एक मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किया गया और फिर उसने दो अन्य लोगों के नामों का खुलासा किया था जिन्होंने कथित तौर पर उसके साथ बलात्कार किया था।

पुलिस ने दो आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था और मजिस्ट्रेट ने उनके खिलाफ अपराध का संज्ञान लिया था। इसके बाद पीड़िता की मां ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में एक आवेदन दायर अपीलकर्ता को पेश करने का आदेश देने का अनुरोध किया था, जिसका पुलिस रिपोर्ट में नाम नहीं था।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आवेदन खारिज कर दिया था जिसके बाद पीड़िता की मां ने सत्र न्यायाधीश के पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल किया।

पुनरीक्षण अदालत ने सीजेएम के आदेश को रद्द कर दिया और मामला वापस मजिस्ट्रेट अदालत को भेज दिया।

सीजेएम ने मामले की सुनवाई की और अपीलकर्ता को सुनवाई के लिए तलब करने का निर्देश दिया था। अपीलकर्ता ने तब सीजेएम के आदेश को चुनौती दी थी लेकिन सत्र न्यायाधीश ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी।

बाद में, उच्च न्यायालय ने मई 2015 में अपीलकर्ता द्वारा दायर याचिका पर अपना फैसला सुनाया और आपराधिक न्यायशास्त्र के सुस्थापित सिद्धांत को दोहराया कि मजिस्ट्रेट द्वारा लिया गया संज्ञान अपराध का है, अपराधी का नहीं।

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