देश की खबरें | उपराज्यपाल मानहानि मामला: दिल्ली उच्च न्यायालय ने मेधा पाटकर की सजा बरकरार रखी

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली के उपराज्यपाल वी के सक्सेना द्वारा साल 2000 में दायर मानहानि के मामले में कार्यकर्ता मेधा पाटकर की दोषसिद्धि और उन्हें दी गई सजा को मंगलवार को बरकरार रखा।

नयी दिल्ली, 29 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली के उपराज्यपाल वी के सक्सेना द्वारा साल 2000 में दायर मानहानि के मामले में कार्यकर्ता मेधा पाटकर की दोषसिद्धि और उन्हें दी गई सजा को मंगलवार को बरकरार रखा।

न्यायमूर्ति शालिंदर कौर ने कहा कि अधीनस्थ अदालत के आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसी आदेश के खिलाफ पाटकर ने उच्च न्यायालय का रुख किया था।

न्यायमूर्ति कौर ने कहा, “इस अदालत को (अधीनस्थ अदालत के) आदेश में कुछ भी अवैध नहीं मिला और फैसले में किसी भी तरह के हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए इसे (अपील को) खारिज किया जाता है।”

सक्सेना ने यह मामला 23 साल पहले दायर किया था, जब वह गुजरात में एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के प्रमुख थे।

उच्च न्यायालय ने कहा कि कहा कि दोषसिद्धि का आदेश साक्ष्यों और कानून पर उचित विचार करने के बाद पारित किया गया था।

इसने कहा कि पाटकर अपनाई गई प्रक्रिया में कोई दोष या कानून में कोई त्रुटि प्रदर्शित करने में विफल रहीं, जिसके कारण न्याय में चूक हुई हो।

न्यायाधीश ने सजा के आदेश को भी बरकरार रखा, जिसमें पाटकर को "अच्छे आचरण की शर्त" पर रिहा किया गया है, और कहा कि इसमें किसी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ अदालत द्वारा अच्छे आचरण पर रिहाई पर लगाई गई शर्त को संशोधित कर दिया। इसके तहत पाटकर को हर तीन महीने में एक बार अधीनस्थ अदालत में पेश होना होगा। वह व्यक्तिगत रूप से पेश या वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से पेश भी हो सकती हैं। इसके अलावा उन्हें वकील के माध्यम से भी हाजिर होने की अनुमति दे गई है।

अदालत ने पाटकर की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने सक्सेना के खिलाफ दर्ज मानहानि के मामले को साबित करने के लिए एक अतिरिक्त गवाह को पेश करने और उससे जिरह करने के लिए आवेदन किया था।

सत्तर वर्षीय पाटकर का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने किया, जबकि सक्सेना की ओर से अधिवक्ता गजिंदर कुमार ने दलीलें रखीं।

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता ने दो अप्रैल के सत्र अदालत के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें मामले में मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा दी गई उनकी सजा को बरकरार रखा गया था।

सत्र अदालत ने मामले में पाटकर की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उन्हें आठ अप्रैल को 25,000 रुपये का परिवीक्षा बांड प्रस्तुत करने पर "अच्छे आचरण" पर रिहा कर दिया था और उन पर एक लाख रुपये का जुर्माना जमा करने की शर्त लगाई थी।

मजिस्ट्रेट अदालत ने एक जुलाई, 2024 को पाटकर को भारतीय दंड संहिता की धारा 500 (मानहानि) के तहत दोषी पाते हुए पांच महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई और 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

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