जरुरी जानकारी | श्रमिक संगठनों ने निजीकरण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. सरकार के निजीकरण की दिशा में तेजी से बढ़ते कदम और कुछ राज्यों द्वारा श्रम कानून में बदलाव के खिलाफ 10 केंद्रीय श्रमिक संगठनों के सदस्यों ने शुक्रवार को विरोध प्रदर्शन किया।

नयी दिल्ली, तीन जुलाई सरकार के निजीकरण की दिशा में तेजी से बढ़ते कदम और कुछ राज्यों द्वारा श्रम कानून में बदलाव के खिलाफ 10 केंद्रीय श्रमिक संगठनों के सदस्यों ने शुक्रवार को विरोध प्रदर्शन किया।

श्रम मंत्रालय के दफ्तर श्रम शक्ति भवन के बाहर विरोध प्रदर्शन के दौरान ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों ने यहां कहा कि औद्योगिक गतिविधियां शुरू होने के बावजूद नियोक्ता अपने सभी कर्मचारियों को काम पर नहीं ले रहे हैं। जिन कर्मचारियों को वापस लिया भी गया है, उन्हें कम वेतन की पेशकश की गयी है और ‘लॉकडाउन’ के दौरान का पारितोषिक नहीं दिया गया है।

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विरोध का आह्वान इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक), ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), हिंद मजदूर सभा (एचएमएस), सेंटर फॉर इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू), ट्रेड यूनियन कॉर्डिनेशन सेंटर (टीयूसीसी), ऑल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर (एआईयूटीयूसी), ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन (एआईसीसीटीयू), एसईडब्ल्यूए, यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (यूटीयूसी) और लेबर प्रोग्रेसिव फेडरेशन (एलपीएफ) ने संयुक्त रूप से किया था।

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने एक बयान में कहा, ‘‘केंद्रीय श्रमिक संगठनों का 3 जुलाई 2020 को विरोध प्रदर्शन श्रम कानून में बदलाव, सरकारी विभागों और केंद्रीय लोक उपक्रमों के निजीकरण के खिलाफ तथा असंगठित क्षेत्र के कामगारों के अधिकारों के लिये किया गया।’’

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बयान के अनुसार विरोध प्रदर्शन देश के अन्य भागों में भी किये गये। विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों ने इसमें भाग लिया।

सीटू ने कहा कि देश में ऐसे लोगों की संख्या 14 करोड़ से अधिक है जिनके पास कोई काम नहीं है। अगर इसमें दिहाड़ी और ठेका कर्मियों को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 24 करोड़ से अधिक होगी।

बयान के अनुसार हम कर्मचारियों और ट्रेड यूनियनों को साथ मिलकर और बीमारी से बचते हुए अपने हितों, अधिकारों की रक्षा, कामकाज की बेहतर स्थिति, वेतन, भविष्य की सुरक्षा आदि के लिये हर संभव कदम उठाने की जरूरत है।

श्रमिक संगठनों के अनुसार सरकार ने कर्मचारियों और लोगों की जरूरतों के प्रति असंवेदनशीलता दिखायी है।

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