देश की खबरें | नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पैरोकार रहे हैं न्यायमूर्ति जोसेफ

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नयी दिल्ली, 19 मई नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना न्यायमूर्ति के. एम. जोसेफ की खासियत रही, जिन्होंने नफरत भरे भाषणों पर कड़ी आपत्ति जताई और चुनावों की "शुद्धता" बनाए रखने के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

शीर्ष अदालत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति के. के. मैथ्यू के बेटे न्यायमूर्ति जोसेफ की 2018 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय से शीर्ष अदालत में नियुक्ति की गई थी। सरकार और न्यायपालिका के बीच लंबे समय तक चले गतिरोध के कारण उनकी नियुक्ति में विलंब हुआ था।

न्यायमूर्ति जोसेफ ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में, 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के नेतृत्व वाली राज्य की कांग्रेस सरकार की बर्खास्तगी के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के आदेश को रद्द कर दिया था।

न्यायमूर्ति जोसेफ शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में चार साल और 10 महीने के कार्यकाल के बाद 16 जून को सेवानिवृत्त हो जाएंगे। 22 मई को शीर्ष अदालत का ग्रीष्मावकाश शुरू होने से पहले शुक्रवार को उनका आखिरी कार्य दिवस था और उन्हें गर्मजोशी के साथ विदाई दी गई।

न्यायमूर्ति जोसेफ के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता कितनी अहमियत रखती थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि अपराध को रोकना और सुरक्षा प्रदान करना सरकार का काम है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जाना चाहिए और गैरकानूनी तरीके से किसी को कैद में नहीं रखा जाना चाहिए।

नफरती भाषणों को गंभीरता से लेते हुए, उनकी अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की एक पीठ ने कहा था कि राजनीति और धर्म को अलग-अलग कर दिया जाए और यदि राजनेता राजनीति में धर्म का इस्तेमाल बंद कर दें, तो इन नफरती भाषणों पर विराम लग जाएगा।

इस साल अप्रैल में, न्यायमूर्ति जोसेफ की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नफरत फैलाने वाले भाषण देने वालों के खिलाफ कोई शिकायत दायर नहीं किये जाने पर भी मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। पीठ ने ऐसे भाषणों को देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को प्रभावित करने वाला "गंभीर अपराध" करार दिया था।

न्यायमूर्ति जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया था कि "चुनाव की शुद्धता" बनाए रखने के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) की एक समिति की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।

इसके अलावा उन्होंने जल्लीकट्टू के खेल, राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद समेत विभिन्न मामलों पर महत्वपूर्ण फैसले सुनाए थे।

उल्लेखनीय है कि 17 जून 1958 को जन्मे न्यायमूर्ति जोसेफ ने जनवरी 1982 में दिल्ली में एक वकील के रूप में पंजीकरण कराया था।

उन्हें 14 अक्टूबर, 2004 को केरल उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था और बाद में उन्हें उत्तराखंड उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया। 31 जुलाई, 2014 को उन्होंने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण किया।

न्यायमूर्ति जोसेफ को 7 अगस्त, 2018 को शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया।

इससे पहले 10 जनवरी, 2018 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए उनके नाम की सिफारिश की थी।

हालांकि अप्रैल 2018 में, सरकार ने उनका नाम वापस कर दिया था और वरिष्ठता क्रम में नीचे होने को आधार बनाते हुए उनकी नियुक्ति पर पुनर्विचार के लिये कहा था।

कॉलेजियम ने मई 2018 में दोबारा उनके नाम की सिफारिश करने का फैसला किया। जुलाई 2018 में सरकार को सिफारिश भेजी गई और सात अगस्त को उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

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