न्यायाधीशों को धमकाने की कोशिशों से सख्ती से निपटना होगा :न्यायालय

न्यायालय ने अपने दो वर्तमान न्यायाधीशों के खिलाफ अपमानजनक आरोप लगाने के लिए दो वकीलों समेत तीन लोगों को अवमानना का दोषी ठहराया और कहा कि न्यायाधीशों को धमकाने की कोशिश करने वाले वकीलों के लिए बेबुनियाद सहानुभूति नहीं हो सकती।

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नयी दिल्ली, 27 अप्रैल उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि नागरिक अदालती फैसलों की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन किसी को न्यायाधीशों की मंशा पर सवाल उठाने का हक नहीं है। शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि न्यायाधीशों को धमकाने की कोशिशों से सख्ती से निपटना होगा।

न्यायालय ने अपने दो वर्तमान न्यायाधीशों के खिलाफ अपमानजनक आरोप लगाने के लिए दो वकीलों समेत तीन लोगों को अवमानना का दोषी ठहराया और कहा कि न्यायाधीशों को धमकाने की कोशिश करने वाले वकीलों के लिए बेबुनियाद सहानुभूति नहीं हो सकती।

शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायपालिका और उसके फैसलों समेत किसी भी संस्थान की सद्भावनापूर्ण और सकारात्मक आलोचना का हमेशा स्वागत है और इसे अदालत की अवमानना नहीं कहा जा सकता।

न्यायालय ने कहा, ‘‘हालांकि, यदि आरोप आलोचना के दायरे से परे जाते हैं और अदालत का अपमान करते हैं तो इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस तरह की टिप्पणियां या लिखित शब्द अदालत की अवमानना हैं।’’

न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने इंडिया बार एसोसिएशन की महाराष्ट्र और गोवा इकाई के अध्यक्ष अधिवक्ता विजय कुर्ले, इंडियन बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अधिवक्ता नीलेश ओझा और एनजीओ ‘ह्यूमन राइट्स सिक्योरिटी काउंसिल’ के राष्ट्रीय सचिव राशिद खान पठान को न्यायाधीशों के खिलाफ अपमानजनक आरोप लगाने के लिए अवमानना का दोषी ठहराया।

शीर्ष अदालत ने सजा तय करने के लिहाज से मामले को एक मई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

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