मंगलुरु, 18 जुलाई (360 इंफो) भारत में इक्कीसवीं शताब्दी के नगर नियोजकों ने सदियों पुरानी संस्कृति को फिर से खोजा है।
धोलावीर 4670 साल पुराना शहर है जिसमें ‘ओर्थोगोनल’ गलियां हैं, नियोजित शहरी स्थान है और भूमिगत जल एवं सीवेज की व्यवस्था है। यूनेस्को ने 2021 में इसे विश्व विरासत स्थल के तौर पर मान्यता दी है। भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसे सैड़कों नियोजित शहर हैं।
भारत के प्रचीन विरासती शहर जलवायु परिवर्तन की बदतर होती स्थिति के दौर में कई सबक सिखाते हैं। ‘स्वदेशी शहरीकरण’ का विचार नगरों और बस्तियों का है जो स्थानीय मौसम और जलवायु पैटर्न के हिसाब से होता है और इसे शिक्षाविदों एवं भवन उद्योग ने स्वीकार किया है। भारत के पुराने शहर, 21वीं सदी के नगर नियोजकों को बहुत कुछ सिखा सकते हैं।
बीसवीं सदी के नगरीकरण की विशेषता शहरों का फैलाव और ऊंच-ऊंची इमारतें हैं। पैट्रिक गेडेस से लेकर लुई ममफोर्ड, जैन जैकब्स जैसे नगर विशेषज्ञों ने माना है कि उपनगर और ऊंची-ऊंची इमारतों वाले शहरी केंद्र टिकाऊ नहीं हैं। उनके व्यापाक पारिस्थितिक प्रभाव होने के साथ-साथ जल प्रबंधन में परेशानी है और समस्याग्रस्त परिवहन व्यवस्था है। इसके साथ ही वे अधिकतर नागरिकों को अच्छी गुणवत्तापूर्ण जिंदगी भी नहीं दे पाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र टिकाऊ विकास लक्ष्य, 21वीं सदी की कल्पना हैं और इसमें जिन चीज़ों को रेखांकित किया गया है कि उन्हें औद्योगिकरण के पूर्व के शहर में पहले ही साकार किया जा चुका है। भारत में पारंपरिक शहर की बुनियादी विशेषता सघन नगर प्रारूप है जिसमें गैर-मोटर चालित पारगमन प्रणाली होती है। ये संसाधनों की बेकार खपत और उच्च प्रदूषण भार को कम करते हैं जो जलवायु परिवर्तन में योगदान देते हैं।
शाहजहानाबाद (मौजूदा पुरानी दिल्ली) जैसा भारतीय शहर नियोजित तरीके से 17वीं सदी में बसाया गया था। इसके अलावा विकासशील देशों में कई पारपंरिक शहर हैं जिनमें वही विशेषताएं हैं जिनकी कल्पना संयुक्त राष्ट्र टिकाऊ विकास लक्ष्य में की गई हैं।
पुराने सघन नगर, आधुनिक महानगरों की तुलना में कम भूमि पर बसे हैं और उनमें से ज्यादातर भौगोलिक रूप से ऊंचाई वाले हिस्सों में हैं जहां अधिक घनत्व होता है लेकिन ऊंची इमारतें नहीं होती हैं। सार्वजनिक परिवहन का अच्छा नेटवर्क होता है और मिश्रित इलाके होते हैं जहां कार्यस्थल, घर और खेलने का स्थान एक ही इलाके में होता है। इनमें आधुनिक नगरों की तुलना में बिजली और इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली की भी कम जरूरत पड़ती है। इससे जीवाश्म ईंधन की खपत कम होती है और जलवायु को भी कम नुकसान होता है।
पुराने शहरों में मिश्रित इलाके होने से दूर जाना नहीं पड़ता है। पुराने शहरों में परिवहन प्रणाली अच्छी होती है और पैदल चलने के स्थल ढके हुए होते हैं, जिनमें ठंडी हवाएं आ रही होती हैं।
लियोन कैरियर, चार्ल्स कोरिया, जान गेहलो जैसे शिक्षाविदों और प्रतिष्ठित शहरी नियोजकों ने कम ऊंची इमारतों- उच्च घनत्व विकास की अहमियत को माना है और इन्हें शहरी फैलाव या ऊंची इमारतों वाले शहरों की तुलना में अधिक टिकाऊ बताया है क्योंकि उनमें ऊर्जा की अधिक खपत होती है। इसके अलावा महामारी ने चीज़ों को और बदतर किया है, क्योंकि संक्रमित व्यक्ति इमारत में ही था और इमारतों में शीशे लगे होते हैं और बाहर से हवा अंदर नहीं आ पाती है जिससे संक्रमण का फैलाव होता है।
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