देश की खबरें | भारत का लोकतांत्रिक स्वरूप संवाद, असहमति और विचार-विमर्श में निहित है: सहस्रबुद्धे

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नयी दिल्ली, 10 जुलाई भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के पूर्व अध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे ने बृहस्पतिवार को कहा कि भारत का लोकतांत्रिक स्वरूप संवाद, असहमति और विचार-विमर्श पर आधारित सहस्राब्दियों पुराने सभ्यतागत मूल्यों से प्रेरित है।

दिल्ली विधानसभा में एक संगोष्ठी में आईसीसीआर के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि भारत के कानून निर्माताओं ने उल्लेखनीय राजनीतिक परिपक्वता और नैतिक स्पष्टता का प्रदर्शन किया, जिसने स्वतंत्र भारत की संसदीय परंपराओं की मजबूत नींव रखी।

सहस्रबुद्धे ने इस बात पर जोर दिया कि भारत का लोकतांत्रिक स्वरूप औपनिवेशिक काल से बहुत पुराना है, तथा यह संवाद, असहमति और विचार-विमर्श पर आधारित सहस्राब्दियों पुराने सभ्यतागत मूल्यों पर आधारित है।

उन्होंने आजादी के नायकों के योगदान का जिक्र करते हुए संस्थागत जवाबदेही और आधुनिकीकरण पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया। उन्होंने युवाओं में नागरिक जागरूकता को बढ़ावा देने में दिल्ली विधानसभा की भूमिका की सराहना की।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के अध्यक्ष राम बहादुर राय और दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने भी ‘‘भारत में स्वतंत्रता-पूर्व संसदीय प्रणाली (1911-1946) और हमारे स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय सदस्यों की भूमिका’’ विषय पर संगोष्ठी को संबोधित किया।

राय ने कहा कि देश के संसदीय इतिहास के आधारभूत क्षणों पर पुनर्विचार करने से इसकी लोकतांत्रिक कल्पना समृद्ध होती है। राय ने इस अवसर पर पंडित मदन मोहन मालवीय को श्रद्धांजलि अर्पित की तथा 1924 से 1930 के बीच ‘सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली’ में उनके द्वारा दिए गए 200 से अधिक भाषणों पर प्रकाश डाला।

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