भारत में एक आम आदमी को कितना महंगा पड़ता है कैंसर का इलाज
एक औसत भारतीय परिवार की सालाना आय है दो से पांच लाख रुपये.
एक औसत भारतीय परिवार की सालाना आय है दो से पांच लाख रुपये. परिवार में किसी को कैंसर हो जाए तो इलाज में 10 से 30 लाख रुपये तक लग सकते हैं. 60 से 70 फीसदी मरीज आर्थिक स्थिति बिगड़ने की वजह से इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं.कैंसर - यह नाम सुनकर एक आम व्यक्ति को जितना डर लगता है उतना ही ज्यादा उनका परिवार इसके खर्चों को लेकर परेशान होता है. भारत में आज भी इसके इलाज में एक आम इंसान की सारी जमा पूंजी खत्म हो जाती है लेकिन कई बार तब भी रोग ठीक नहीं हो पाता.
भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यूनियन बजट 2026-27 में कैंसर के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली 17 आयातित दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी माफ कर दी है. इसकी वजह से यह दवाएं अब भारत में सस्ती मिलेंगी. बजट में आयातित दवाइयों पर 10 फीसदी की इंपोर्ट ड्यूटी हटा दी गई है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि अगर किसी एक दवा की कीमत दो से तीन लाख रुपए प्रति माह है तो उस पर 25,000 से 30,000 रुपए की इंपोर्ट ड्यूटी लगती थी. अब यह ड्यूटी हटा दी गई है जिससे दवा 30 हजार रुपए तक सस्ती हो जाएगी.
कौन सी दवाएं हुईं सस्ती
कस्टम ड्यूटी से छूट मिली हुई कैंसर की 17 दवाएं मुख्य रूप से एडवांस्ड कैंसर थेरेपी के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं. इन दवाओं का उपयोग स्तन कैंसर के इलाज के दौरान टारगेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, ब्लड कैंसर के लिए CAR-T सेल थेरेपी, और फेफड़ों के कैंसर के लिए टायरोसिन किनेज इनहिबिटर्स समेत प्रोस्टेट कैंसर, सॉलिड ट्यूमर, लिम्फोमा और मेलानोमा जैसे कई प्रकारों में इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
कैंसर विशेषज्ञ कहते हैं कि यह दवाईयां ज्यादातर मेटास्टैटिक यानी एडवांस्ड कैंसर स्टेज के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं. इस स्तर पर कीमोथेरेपी से मरीजों को उतना फायदा नहीं मिल पाता और इस स्थिति तक आते-आते मरीज इलाज पर काफी खर्च कर चुका होता है. ऐसे में कीमत कम होने से मरीजों को सबसे अधिक फायदा होगा क्योंकि आयात शुल्क हटाने से इन दवाओं का रिटेल प्राइस कम होगा. इससे लंबे इलाज के दौरान मरीजों पर पड़ा आर्थिक बोझ हल्का होगा और एडवांस्ड थेरेपी में मरीजों को मदद मिलेगी. हालांकि, इसके बावजूद कैंसर के कुल इलाज का खर्च अभी भी काफी अधिक है.
कितना महंगा है कैंसर का इलाज
उत्तराखंड में हिमालय अस्पताल देहरादून में बतौर प्रोफेसर कार्यरत डॉ एस के वर्मा कैंसर के मरीजों का इलाज भी करते हैं. डॉ. वर्मा बताते हैं कि सरकारी व्यवस्था में कई ऐसी योजनाएं हैं जिनसे कैंसर के मरीजों को निशुल्क इलाज मिल जाता है. वर्तमान में स्तन कैंसर भारत में सबसे ज्यादा होने वाली कैंसर की किस्मों में से एक है. सरकार ने उससे जुड़ी ज्यादातर दवाओं को बेहद कम दामों पर उपलब्ध करवाना शुरू किया है. हालांकि कई ऐसे मॉलिक्यूल होते हैं जो एडवांस ट्रीटमेंट जैसे कि इम्यूनोथेरेपी आदि में काम आते हैं, उस पर योजना लागू नहीं हो पाती.
कैंसर पर डब्ल्यूएचओ की नई चेतावनी: जानें क्या हैं बड़े खतरे
कैंसर के मरीजों की सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ज्यादातर मरीज रोग के गंभीर होने के बाद ही अस्पताल पहुंचते हैं. डॉ वर्मा बताते हैं कि अक्सर लक्षण नहीं दिखाने पर या दर्द न होने के कारण मरीजों को बीमारी का पता नहीं चल पाता और जब तक वह अस्पताल पहुंचते हैं तब तक कैंसर एडवांस स्टेज पर पहुंच चुका होता है. इसके बाद उन्हें सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है.
इससे परे कुछ ऐसे भी मरीज होते हैं जो आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं के दायरे से बाहर होते हैं. उनके लिए कैंसर के इलाज की प्रक्रिया काफी संघर्ष भरी होती है. डॉ वर्मा बताते हैं, "भले ही अस्पताल के अंदर इलाज की प्रक्रिया सस्ती हो गई हो पर इसके बावजूद कैंसर के मरीजों के लिए संघर्ष इतनी जल्दी खत्म नहीं होते. घर से अस्पताल तक आने का खर्च, तीमारदार के मरीज के साथ रहने और खाने-पीने का खर्च समेत कई ऐसी लागत भी होती है जिनकी गिनती नहीं हो पाती, लेकिन वह आर्थिक बोझ का हिस्सा जरूर बनते जाते हैं.”
फार्मा रिसर्च में सरकार के योगदान की जरूरत
एक औसत भारतीय परिवार की सालाना आय दो से पांच लाख रुपए तक होती है जबकि इस परिवार में यदि किसी को कैंसर हो जाए तो उसके इलाज का खर्च 10 से 30 लाख रुपए तक आ सकता है. आंकड़े कहते हैं कि 60 से 70 फीसदी मरीज आर्थिक स्थिति बिगड़ने के वजह से इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं. 50 फीसदी से अधिक कैंसर के मरीज तो आर्थिक तंगी की वजह से गरीबी रेखा से भी नीचे चले जाते हैं. ग्रामीण क्षेत्र की बात की जाए तो 80 प्रतिशत परिवार इलाज के लिए साहूकारों से या तो कर्ज लेते हैं या फिर उन्हें अपनी संपत्ति को बेचना पड़ता है.
भारत में कैंसर के मरीजों के आंकड़ों की बात की जाए तो 2022 में 14.6 लाख नए मामले सामने आए थे. सालाना 8 लाख लोगों की कैंसर की वजह से मौत हो जाती है. यह विश्व में कैंसर से मरने वालों की कुल तादाद का करीब एक चौथाई हिस्सा है. एक अनुमान में बताया गया है कि 2026 में कैंसर के नए मरीजों की संख्या 20 लाख से भी अधिक हो सकती है. अनुमान है कि 2045 तक यह आंकड़ा 67 फीसदी तक बढ़ सकता है यानी सालाना लगभग 24 लाख नए मामले सामने आ सकते हैं. भारत में मुख्य रूप से ब्रेस्ट कैंसर, ओरल कैंसर, लंग कैंसर और सर्वाइकल कैंसर के मामले देखने को मिलते हैं.
ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को पांच साल पहले पकड़ने वाला नया एआई मॉडल
डॉ. रूद्र प्रसाद आचार्य दिल्ली के द्वारका स्थित वेंकटेश्वरा अस्पताल में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी और रोबोटिक्स ऑन्कोसर्जरी विभाग के निदेशक हैं. वह कहते हैं, "कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज के लिए सबसे ज्यादा खर्च रिसर्च और डेवलपमेंट में होता है किसी भी मॉलिक्यूल का इलाज में क्या योगदान होगा इस पर वर्षों तक शोध चलता है और उसे शोध के सफल होने के बाद इस अनुसंधान में खर्च हुई लागत को दवाइयों में जोड़ा जाता है. यही कारण है की गंभीर बीमारियों की दवाइयां महंगी होती हैं."
फार्माकोलॉजी सेक्टर में हर बीमारी को लेकर कोई न कोई अनुसंधान चल रहा है. उसकी दवाइयां तैयार हो रही हैं. डॉ. रूद्र प्रसाद आचार्य का कहना है कि सरकार फार्मोकोलॉजी सेक्टर में रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए बजट जारी नहीं करती और इसी वजह से इसका खामियाजा मरीज को भुगतना पड़ता है. उनकी दवाइयां महंगी होती हैं. अगर सरकार फार्माकोलॉजी सेक्टर के अनुसंधान पर भी बजट जारी करे तो जाहिर तौर पर दवाइयां काफी हद तक सस्ती हो सकती हैं.
गंभीर मरीजों को कुछ राहत, लेकिन शुरुआती स्टेज के कैंसर का इलाज अब भी महंगा
एडवांस्ड स्टेज पर पहुंचने वाले कैंसर के रोगियों के इलाज में उपयोग होने वाली दवाइयां को सस्ता किया गया है. इससे कैंसर के बेहद गंभीर मरीजों को कुछ हद तक राहत मिल सकती है. हालांकि जो मरीज शुरुआती कैंसर का इलाज करवा रहे हैं या फिर जिम एडवांस्ड थेरेपी की आवश्यकता नहीं है उन मरीजों के लिए अब भी कैंसर का इलाज महंगा है और उनकी आर्थिक स्थिति पर बोझ डालने वाला है. डॉ. आचार्य कहते हैं, "अगर हम मान कर चलें कि 100 फीसदी मरीज कैंसर के आ रहे हैं तो उसमें से 15 फीसदी मरीजों को इन एडवांस्ड थेरेपी की आवश्यकता पड़ती है. ऐसे में उतने ही मरीजों को दवाइयों में छूट से कुछ आर्थिक राहत मिल सकती है.”
डॉ. आचार्य कहते हैं कि उनकी ओपीडी में हर महीने लगभग 50 नए मरीज आते हैं. इसके अलावा कैंसर के इलाज के दौरान लगभग 30 प्रतिशत मरीज ऐसे होते हैं जो आर्थिक तंगी के चलते इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं. डॉ. आचार्य बताते हैं कि जिन दवाइयों पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाई गई है वे लगभग सारी दवाइयां बाहर से आती हैं. हालांकि उन पर भारत में भी रिसर्च की जा रही है. कुछ एक दवाइयों का उत्पादन भारत में अभी शुरू करने की तैयारी की जा रही है. वह बताते हैं कि अनुसंधान के बाद अगर भारत में यही दवाइयां तैयार होने लगे तो इनकी लागत आधी तक घट सकती है.
भारत में धूम्रपान नहीं करने वाले भी लंग कैंसर की चपेट में
दवाइयों की रिसर्च का एक दूसरा पहलू यह भी है कि इन दवाइयां पर कई वर्षों का अनुसंधान लगता है जिसमें काफी पैसों की आवश्यकता पड़ती है. अनुसंधान में खर्च हुए पैसों को दवाइयों के उत्पादन में लागत के तौर पर जोर दिया जाता है और इसी वजह से दवाइयां महंगी बिकती हैं. दवाइयां के प्राथमिक उत्पादन के तौर पर अगर 3 वर्षों तक भी वह लागत जोड़ी जाए तो दवाइयां काफी महंगी मिलती हैं. इसके बाद अन्य शोध संस्थान भी उन दवाइयों पर रिसर्च शुरू कर देते हैं. इससे उन दवाइयों के सस्ते होने की संभावना बढ़ जाती है. डॉ. आचार्य कहते हैं कि किसी भी बीमारी के इलाज में काम आने वाली दवाइयां पर लंबा रिसर्च चलता है. इसके बाद एक ‘सेफ ड्रग' मार्केट में आने के लिए तैयार होती है.
कैंसर के मरीजों की सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ज्यादातर मरीज रोग गंभीर होने के बाद ही अस्पताल तक पहुंचाते हैं. डॉ एस के वर्मा बताते हैं कि अक्सर संय पर लक्षण नहीं दिखाने पर या दर्द न होने के कारण मरीजों को बीमारी का पता नहीं चल पाता और जब तक वह अस्पताल पहुंचते हैं तब तक कैंसर एडवांस स्टेज पर पहुंच चुका होता है. इसके बाद उन्हें सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है.
एक आम व्यक्ति पर पड़ने वाले कैंसर के इलाज का आर्थिक बोझ इतना अधिक होता है कि कभी-कभी मरीज इलाज बीच में ही छोड़ देता है. डॉ. आचार्य बताते हैं, अगर किसी को भी कैंसर के लक्षण होते हैं तो सबसे पहले उसकी जांच होगी. उसके बाद वह कैंसर के स्तर के आधार पर सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी जैसी कई प्रक्रियाओं से गुजरेगा. ऐसे में औसतन एक मरीज को कैंसर के कुल इलाज में कम से कम 10 लाख रुपए तक का खर्च आ सकता है. यह खर्च कैंसर की गंभीरता के आधार पर 50 लाख या उससे अधिक भी हो सकता है. ऐसे में एक परिवार के लिए है ये काफी बड़ा आर्थिक बोझ है.
निजी संस्थानों पर ज्यादा भरोसा
भारत में भले ही सरकारी सहायता के तौर पर आयुष्मान भारत योजना लागू है जिसमें पांच लाख रुपए तक के इलाज की सेवाएं निशुल्क हैं लेकिन इनमें भी कई एडवांस्ड दवाएं और प्राइवेट अस्पतालों को कर नहीं किया गया है. आंकड़े यह भी कहते हैं कि भारत में 40 फीसदी मरीज इस तरह की बीमारियों के इलाज के लिए प्राइवेट संस्थानों पर अधिक भरोसा करते हैं.
निजी संस्थानों में मरीजों के विश्वास या अधिक जाने के सवाल पर डॉ. आचार्य का कहना है कि सरकारी संस्थान काफी हद तक मरीजों को निशुल्क या बेहद कम दामों पर इलाज मुहैया करवाने का प्रयास करता है लेकिन अब भी सरकारी चिकित्सा संस्थानों में कई सुपर एडवांस मशीनों या इलाज की प्रक्रियाओं की सुविधा कम है या नहीं है. इसके लिए मरीज को निजी संस्थाओं का रुख करना पड़ता है.
कैंसर के मरीजों के इलाज का खर्च कम करने के सवाल पर डॉ. आचार्य कहते हैं, "यह काफी मुश्किल है. आजकल कई एडवांस्ड इलाज की प्रक्रियाओं पर लगातार शोध हो रहा है. प्राइवेट कंपनियां रिसर्च और डेवलपमेंट में काफी पैसे लगाती हैं ताकि बेहतर इलाज की प्रक्रिया को सामने ला सकें, लेकिन इस दौरान आर एंड डी में काफी पैसे खर्च होते हैं जिसे निकालने के लिए अंततः मरीज पर बोझ बढ़ता है."
डॉ. आचार्य का कहना है कि सरकार के लिए सुझाव यह है कि गंभीर बीमारियों के इलाज में फार्मास्यूटिकल कंपनियों को रिसर्च एंड डेवलपमेंट में सहायता दें. उनकी रिसर्च में मदद होने पर इलाज की प्रक्रिया में मरीज पर बोझ घटेगा. डॉ. आचार्य का कहना है कि चीन और अमेरिका में फार्मास्यूटिकल कंपनियों के रिसर्च के लिए सरकार रिसर्च और डेवलपमेंट में सहायता के साथ-साथ उन्हें अनुसंधान के लिए उपयुक्त जगह और इमारत तक बना कर उन्हें मुहैया करवाती है. इसी की वजह से वहां पर मरीजों को इलाज का खर्च भारत की अपेक्षा कम पड़ता है.
वहीं, कैंसर के स्क्रीनिंग प्रोग्राम की सूरत भी कुछ खास अच्छी नहीं है. इस बाबत डॉ एस के वर्मा कहते हैं, "भारत में अभी भी कैंसर को लेकर स्क्रीनिंग प्रोग्राम स्तर पर नहीं पहुंच पाए हैं. इन्हें बड़े शहरों के साथ-साथ दूर दराज के गांव तक भी पहुंचना बहुत जरूरी है. तभी कैंसर का सही समय पर पता चलेगा और रोग के इलाज में हम सही रूप से सफल होने की स्थिति तक पहुंचेंगे."