देश की खबरें | हनी बाबू को ब्रीच कैंडी अस्पताल में जाने की इजाजत मिली

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मुंबई, 19 मई बंबई उच्च न्यायालय ने बुधवार को एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में आरोपी एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर हनी बाबू को उपचार के लिए यहां निजी ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती होने की अनुमति दे दी।

हनी बाबू ने बुधवार सुबह बंबई उच्च न्यायालय का रुख करते हुए कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद आंख में हुए संक्रमण के लिए चिकित्सीय सहायता मांगी।

अदालत ने कहा कि बाबू को बृहस्पतिवार को पुलिस सुरक्षा में ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया जाना चाहिए और वहां उनके इलाज तथा उन्हें दी जाने वाली दवाओं का खर्च वह और उनका परिवार उठाएंगे।

हनी बाबू को इस महीने की शुरूआत में कोरोना वायरस संक्रमित पाया गया था और वह फिलहाल मुंबई के सरकारी जी टी अस्पताल में इलाज करा रहे हैं।

पिछले सप्ताह नवी मुंबई में तलोजा जेल के अधिकारी उन्हें यहां जे जे अस्पताल लाये थे जहां से उन्हें जी टी अस्पताल भेजा गया।

बाबू की पत्नी जेनी रोवेना ने बुधवार सुबह उच्च न्यायालय से अपने पति के लिए अंतरिम जमानत और चिकित्सा सहायता का अनुरोध किया।

बाबू के वकील युग चौधरी ने न्यायमूर्ति एसजे कत्थावाला और न्यायमूर्ति एसपी तावड़े की अवकाशकालीन पीठ से याचिका पर इस आधार पर जल्द सुनवाई का अनुरोध किया कि कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद बाबू की आंख में गंभीर संक्रमण हो गया और उनकी बांयी आंख की रोशनी जाने का खतरा है।

चौधरी ने कहा कि बाबू की जांच कराई जानी चाहिए ताकि ‘ब्लैक फंगस’ की आशंका को खारिज किया जा सके।

‘म्यूकरमाइकोसिस’ या ‘ब्लैक फंगस’ एक दुर्लभ गंभीर संक्रमण है, जो कोविड-19 के कई मरीजों में पायी जा रही है।

इसके बाद पीठ ने जी टी अस्पताल के डीन डॉक्टर बी जी चिखालकर को तलब किया जो अन्य डॉक्टरों के साथ वीडियो-कॉन्फ्रेंस से पेश हुए और उन्होंने पीठ को बताया कि बाबू का उचित इलाज किया जा रहा है।

तब अदालत ने पीठ और हनी बाबू के बीच वीडियो कॉल का बंदोबस्त करने को कहा।

जब बाबू ऑनलाइन आये तो उन्होंने अदालत से कहा कि वह जी टी अस्पताल के उपचार से संतुष्ट हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरी आंख अब थोड़ी बेहतर है। मैं संतुष्ट हूं।’’

अस्पताल अधिकारियों ने अदालत से कहा कि उनके पास एमआरआई एंजियो जांच करने की सुविधा नहीं है जो जे जे अस्पताल ने बाबू के मस्तिष्क के लिए कराने की सिफारिश की है।

चौधरी ने अदालत से कहा कि बाबू को अन्य कई विशेष जांच कराने की जरूरत है और उन्हें अंतरिम जमानत दी जानी चाहिए।

वकील ने बाबू की ओर से कहा, ‘‘अगर सरकार मेरी देखभाल नहीं कर सकती, तो मुझे अपनी और अपनी जिंदगी की देखभाल करने दी जाए।’’

अदालत ने कहा कि वह बाबू को जमानत नहीं देगी, लेकिन उन्हें उनकी पसंद के अस्पताल में भर्ती करने की अनुमति दे सकती है।

एनआईए के वकील अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल अनिल सिंह ने इसका विरोध किया और कहा कि शहर के जे जे अस्पताल, केईएम अस्पताल, नायर अस्पताल सभी में बाबू के इलाज की सुविधा है।

उन्होंने कहा, ‘‘ऐसे तो यह परंपरा बन जाएगी और सभी कैदी निजी अस्पतालों में जाना चाहेंगे।’’

हालांकि अदालत ने उनकी दलील को खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा कि इसे खासतौर पर मौजूदा हालात में मिसाल बनाने में कुछ गलत नहीं है।

उसने कहा, ‘‘परिवार को कम से कम यह मानसिक संतोष तो मिले कि उनका इलाज उनकी पसंद के अस्पताल में किया जा रहा है, विशेष रूप से जब वे बिल का खर्च उठा रहे हैं।’’

अदालत ने ब्रीच कैंडी अस्पताल को निर्देश दिया कि बाबू की मेडिकल रिपोर्ट नौ जून को मामले में अगली सुनवाई वाले दिन या जब बाबू को अस्पताल से छुट्टी दी जाए, तब अदालत में जमा की जाए।

बाबू के परिवार और वकील के अनुसार उन्हें तीन मई को आंख में गंभीर संक्रमण हो गया था और उन्हें अभी तक उचित इलाज नहीं मिला है।

बाबू (55) को राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने पिछले साल जुलाई में गिरफ्तार किया था।

पुलिस के अनुसार, कुछ कार्यकर्ताओं ने 31 दिसम्बर 2017 को पुणे में एल्गार परिषद की बैठक में कथित रूप से उत्तेजक और भड़काऊ भाषण दिया था, जिससे अगले दिन जिले के कोरेगांव भीमा में हिंसा भड़की थी।

यह भी आरोप है कि इस कार्यक्रम को कुछ माओवादी संगठनों का समर्थन प्राप्त था।

मामले की जांच बाद में एनआईए ने अपने हाथ में ले ली थी।

मामले में सुधा भारद्वाज और वरवरा राव सहित कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है।

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