अलीगढ़ (उप्र), 17 अक्टूबर कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की मानद प्रोफेसर और प्रसिद्ध इतिहासकार बारबरा मेटकाफ ने सोमवार को कहा कि उलेमा एक सामाजिक श्रेणी है जिन्हें उनकी शारीरिक वेषभूषा के कारण प्राय: रूढ़िवादी माना जाता है। उन्होंने इतिहासकारों से अनुरोध किया कि वे रूढ़िवादिता से ऊपर उठे क्योंकि ‘‘न्यायपूर्ण इतिहास से ही न्यायपूर्ण राजनीति हासिल होती है।’’
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के संस्थापक सर सैयद अहमद खान की 205 वीं जयंती पर विश्वविद्यालय द्वारा 2022 के लिए 'सर सैयद एक्सीलेंस अवार्ड' से सम्मानित किए जाने पर कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में इतिहास की मानद प्रोफेसर मेटकाफ ने अपने अनुमोदन भाषण में यह टिप्पणी की।
उन्होंने भारत में ‘‘गंभीर साक्ष्य आधारित इतिहास’’ के बेहद जरूरी महत्व को बढ़ावा देने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
उन्होंने इस बात कि ओर ध्यान दिलाया कि भारतीय नागरिक वर्ग के इतिहास में मुस्लिमों की अहम भागीदारी है किंतु उनके इतिहास का कम अध्ययन होता है।
मेटकाफ ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि भारतीय राष्ट्रवाद और भारतीय मुसलमानों की भूमिका, विशेष रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में इस्लामी विद्वानों की भूमिका पर उनके अध्ययन ने उन्हें आश्वस्त किया था कि इस्लामी विद्वान, उलेमा, "एक सामाजिक श्रेणी है जिसे अक्सर उनकी शारीरिक वेषभूषा के कारण रूढ़ियों के अधीन किया जाता है ।"
उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत सहित दुनिया भर के इतिहासकारों से "रूढ़िवादिता से ऊपर उठने" का जोरदार आह्वान किया और कहा कि "न्यायपूर्ण इतिहास से ही न्यायपूर्ण राजनीति हासिल होती है"।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देवबंद स्कूल के मौलाना हुसैन अहमद मदनी जैसे भारतीय उलेमाओं के बीच प्रचलित प्रमुख विचारधारा पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने कहा कि इन इस्लामी विद्वानों ने जोर देकर कहा था कि भारतीय मुसलमानों के लिए, भारत की मिट्टी पवित्र है।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष और जाने-माने न्यायविद ताहिर महमूद इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार के महानिदेशक चंदन सिन्हा इस आयोजन के विशिष्ट अतिथि थे।
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