देश की खबरें | उच्च न्यायालय ने माओवादियों से जुड़ाव मामले में डीयू के पूर्व प्रोफेसर साईबाबा को बरी किया
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. बंबई उच्च न्यायालय ने माओवादियों से कथित जुड़ाव के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के पूर्व प्रोफेसर जी एन साईबाबा को गिरफ्तारी के करीब आठ साल बाद शुक्रवार को बरी कर दिया।
मुंबई, 14 अक्टूबर बंबई उच्च न्यायालय ने माओवादियों से कथित जुड़ाव के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के पूर्व प्रोफेसर जी एन साईबाबा को गिरफ्तारी के करीब आठ साल बाद शुक्रवार को बरी कर दिया।
अदालत ने कहा कि गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधानों के तहत मामले में आरोपी के खिलाफ अभियोग चलाने की मंजूरी देने का आदेश ‘‘कानून की दृष्टि से गलत एवं अवैध’’ था। उच्च न्यायालय के आदेश के कुछ घंटों बाद, महाराष्ट्र सरकार ने फैसले पर रोक के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। लेकिन शीर्ष अदालत ने इसे अस्वीकार कर दिया।
निचली अदालत द्वारा साईबाबा को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि आतंकवाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक खतरा है और आतंक के घृणित कृत्य सामूहिक सामाजिक क्रोध और पीड़ा उत्पन्न करते हैं।
साईबाबा (52) के वकीलों ने कहा कि साईबाबा को शनिवार को नागपुर केंद्रीय जेल से रिहा किए जाने की संभावना है, जहां वह मई 2014 में गिरफ्तारी के बाद से बंद है।
न्यायमूर्ति रोहित देव और न्यायमूर्ति अनिल पानसरे की नागपुर खंडपीठ ने 101 पृष्ठों में दिए फैसले में कहा है कि यूएपीए के तहत आरोपी पर मुकदमा चलाने की मंजूरी का आदेश ‘‘कानून की दृष्टि से गलत और अवैध’’ था।
साईबाबा शारीरिक अक्षमता के कारण व्हीलचेयर की मदद लेते हैं। अदालत ने कहा कि साईंबाबा, को तत्काल रिहा किया जाना चाहिए, जब तक कि किसी अन्य मामले में उनकी हिरासत की आवश्यकता न हो।
फैसले का स्वागत करते हुए साईबाबा की पत्नी ए एस वसंत कुमारी ने कहा कि उन्हें विश्वास था कि उनको मामले से बरी कर दिया जाएगा क्योंकि वह निर्दोष हैं।
उच्च न्यायालय ने पांच अन्य दोषियों द्वारा दायर अपील को मंजूर करते हुए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।
मार्च 2017 में, महाराष्ट्र के गडचिरोली जिले की एक सत्र अदालत ने साईबाबा और एक पत्रकार तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र सहित अन्य को माओवादियों से कथित संबंध और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की गतिविधियों में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया था। अदालत ने साईबाबा और अन्य को यूएपीए और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के विभिन्न प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया था।
आरोपियों के खिलाफ यूएपीए के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी 2014 में पांच आरोपियों के खिलाफ और 2015 में साईबाबा के खिलाफ दी गई थी।
पीठ ने कहा कि 2014 में जब निचली अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा दायर आरोपपत्र पर संज्ञान लिया था, तब साईबाबा के खिलाफ यूएपीए के तहत मुकदमा चलाने की कोई मंजूरी नहीं थी।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि यूएपीए के तहत वैध मंजूरी के अभाव में निचली अदालत की कार्यवाही ‘‘शून्य और अमान्य’’ थी और इसलिए फैसला (निचली अदालत का) रद्द करने योग्य है।
अदालत ने माना कि आतंकवाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक खतरा है और आतंक के घृणित कृत्य सामूहिक सामाजिक क्रोध और पीड़ा उत्पन्न करते हैं। फैसले में कहा गया, ‘‘आतंक के खिलाफ युद्ध सरकार द्वारा दृढ़ संकल्प के साथ छेड़ा जाना चाहिए और आतंक के खिलाफ लड़ाई में शस्त्रागार के हर वैध हथियार को तैनात किया जाना चाहिए, एक नागरिक लोकतांत्रिक समाज कानूनी रूप से प्रदान किए गए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय त्यागे जाने को सहन नहीं कर सकता...।’’
साईबाबा की पत्नी वसंत कुमारी ने पीटीआई- से कहा, ‘‘हमें भरोसा था कि वह बरी हो जाएंगे क्योंकि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया। कोई अपराध और सबूत नहीं था। मैं न्यायपालिका तथा हमारा समर्थन करने वाले सभी लोगों की शुक्रगुजार हूं।’’
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