प्रकृति से आती है दुनिया की आधी जीडीपी

दुनिया भर में कीड़ों की संख्या में गिरावट आ रही है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दुनिया भर में कीड़ों की संख्या में गिरावट आ रही है. मधुमक्खियां दुनिया के कुल खाने में से करीब एक-तिहाई के लिए जिम्मेदार हैं. और कई जानकार मानते हैं कि इस ओर ध्यान दिए जाने में काफी देर हो चुकी है.गर्मी इतनी ज्यादा कि बंदर पेड़ों से गिरकर मर जा रहे हैं. मेक्सिको के तटीय राज्य तबास्को में पिछले हफ्ते में 138 हाउलर बंदर मृत पाए गए हैं. मेक्सिको में जबरदस्त गर्मी पड़ रही है. मार्च से अब तक 26 लोगों की मौत भी हो चुकी है. लेकिन तापमान में थोड़ी सी बढ़ोतरी भी जीवों की कई प्रजातियों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है.

नासा के मुताबिक 19वीं शताब्दी के औद्योगिक दौर से पूर्व के औसत तापमान के मुकाबले, साल 2023 में ही पृथ्वी का औसत तापमान 2.5 डिग्री बढ़ चुका था. पिछले दस साल लगातार सबसे गर्म साल रहे हैं. गर्मी की इन घातक स्थितियों से जैव-विविधता को काफी नुकसान पहुंच रहा है.

जैव-विविधता के कई दुश्मन

दुनिया में जैव-विविधता पर ऐसे तमाम खतरे हैं.ग्लोबल वॉर्मिंग के अलावा बढ़ता औद्योगीकरण और प्रदूषण भी जैव-विविधता को खतरे में डाल रहे हैं. करीब तीन दशक पहले दिसंबर, 1993 में ही संयुक्त राष्ट्र ने जैव विविधता को लेकर दुनिया भर के लिए कुछ सामान्य नियम तय किए थे. फिलहाल इस समझौते में 196 सदस्य शामिल हैं यानी पूरी दुनिया इन नियमों को मानती है. साल 2000 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता संरक्षण दिवस घोषित किया था क्योंकि इसी दिन नियमों के शुरुआती मसौदे पर सहमति बनी थी.

जैव विविधता को लेकर नियमों और कानूनों को और कठोर किए जाने की जरूरत दिनोंदिन बढ़ रही है. फिलहाल दुनिया का करीब 17 फीसदी जमीनी हिस्सा और 8 फीसदी समुद्री हिस्सा संरक्षित है. जहां जैव-विविधता कथित तौर पर वनों की कटाई, संसाधनों के शोषण और प्रदूषण से सुरक्षित है. लेकिन इन इलाकों को भी जलवायु परिवर्तन, बाढ़-सूखा और जंगली आग जैसे खतरे नुकसान पहुंचा रहे हैं.

खत्म हो जाएंगे बांग्लादेश जितने इलाके के मैंग्रोव वन

जैव विविधता संरक्षण दिवस पर लुप्तप्राय प्रजातियों की लिस्ट जारी करने वाली संस्था इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) ने मैंग्रोव वनों को लेकर एक स्टडी जारी की है. इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्रदूषण के चलते दुनिया के आधे से ज्यादा मैंग्रोव वनों पर खत्म होने का खतरा है. संस्था ने पहली बार दुनिया के 36 अलग-अलग इलाकों के मैंग्रोव वनों का अध्ययन करने के बाद यह बात कही है.

दुनिया के 15 फीसदी समुद्र तट मैंग्रोव वनों से घिरे हुए हैं. ये धरती के 1.5 लाख वर्ग किमी इलाके में फैले हुए हैं, यानी बांग्लादेश जितने बड़े इलाके में. 20 फीसदी मैंग्रोव वनों पर खत्म होने का जबरदस्त खतरा है. संस्था के प्रमुख ग्रेथल आगिलार कहते हैं, "इससे साथ मिलकर मैंग्रोव वनों के संरक्षण को लेकर तुरंत कोशिशें किए जाने की जरूरत सामने आई है, जो दुनिया में लाखों अहम जीवों का बसेरा हैं."

प्रकृति से आती है दुनिया की आधी जीडीपी

इंसानों के चलते जैव-विविधता को होने वाला नुकसान दुनिया में जीवों के छठे सबसे बड़े खात्मे की वजह बन रहा है. इसके चलते दुनिया में जानवरों और पौधों की एक-तिहाई प्रजातियों के अगली कुछ शताब्दियों में खत्म हो जाने का डर है. यह सिर्फ प्रकृति के लिए ही नुकसान नहीं होगा बल्कि इसका खामियाजा लोगों को भी उठाना पड़ेगा. जैव-विविधता, वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी बहुत मायने रखती है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की उप-प्रमुख एलिजाबेथ मारूमा मेर्मा ने एक इंटरव्यू में बताया, "दुनिया के कुल जीडीपी का 50 फीसदी प्रकृति से आता है. जैव-विविधता को संरश्रित करने से ना सिर्फ धरती पर जीवन की रक्षा होगी बल्कि साल 2030 तक दुनिया में 40 करोड़ अतिरिक्त रोजगार भी पैदा होंगे."

कीड़े नहीं तो खाना नहीं

दुनिया में कीड़ों की घटती संख्या और खतरे के निशान तक पहुंचती उनकी कई प्रजातियों को लेकर गहरी चिंता है क्योंकि पौधों के परागण में उनकी खास भूमिका होती है. साल 2019 में आई एक स्टडी में कहा गया था कि सिर्फ अगले कुछ दशकों में ही कीड़ों की आबादी में 40 फीसदी तक की कमी आ सकती है. अगर कीड़े नहीं हुए तो दुनिया भर की खेती पर इसका काफी बुरा असर होगा. बढ़ते खाद्य संकट के बीच यह गंभीर चिंता की बात होनी चाहिए.

दुनिया में पुर्तगाल जितने इलाके के बराबर जंगल हर साल काटे जाते हैं. जंगल कटने के साथ ही उन इलाकों में मौजूद जैव-विविधता भी खत्म हो जाती है. काटे जंगलों में से आधे को फिर से कहीं और लगाया भी जाता है लेकिन फिर जंगल लगाने से उनमें जैव-विविधता पूरी तरह नहीं लौट पाती. ऐसे में जानकार मूलनिवासी समुदायों के जंगली जमीनों पर हक को लेकर समझौता करना चाहते हैं. ताकि सदियों से जैव-विविधता के रक्षक रहे ये लोग अपनी संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को भी बचा सकें.

हालांकि जैव-विविधता को बचाने के इन प्रयासों पर काफी खर्च भी होगा. कुछ अनुमान कहते हैं कि इसके लिए साल 2030 तक हर साल 824 बिलियन डॉलर का निवेश इस क्षेत्र में करना होगा. यह खर्च 2023 के अमेरिकी सेना के बजट से 10 फीसदी ही कम है. इतना खर्च विकासशील और गरीब देश खुद से नहीं उठा सकते, इसलिए वो अमीर देशों से यह फंड मांगते हैं. हालांकि अभी ऐसे फंड 100 बिलियन डॉलर तक ही पहुंच सके हैं.

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