देश की खबरें | कैदियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य : दिल्ली उच्च न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने जेल में बंद कैदियों के दो समूहों के बीच झगड़े में मारे गए एक कैदी के परिजनों को मुआवजा देने का फैसला सुनाते हुए कहा है कि हिरासत में रखे गये कैदियों की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य है।

नयी दिल्ली, 13 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने जेल में बंद कैदियों के दो समूहों के बीच झगड़े में मारे गए एक कैदी के परिजनों को मुआवजा देने का फैसला सुनाते हुए कहा है कि हिरासत में रखे गये कैदियों की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य है।

अदालत ने यह भी कहा कि जेलों में "गिरोहों" को पनपने नहीं देना चाहिए।

उच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार का कर्तव्य है कि वह आम जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करे और इसमें (आम जनता में) जेल में बंद व्यक्ति भी शामिल हैं, इसलिए हिरासत में अप्राकृतिक मौतों के मामलों में मुआवजा देना सरकार की जिम्मेदारी है।

न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर ने दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएसएलएसए) को मृतक जावेद के परिजनों को तीन लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिसमें से एक लाख रुपये पहले ही उसकी मां (अब दिवंगत) को दिए जा चुके थे।

उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को पारित अपने फैसले में कहा, ‘‘इस न्यायालय का स्पष्ट मत है कि सरकार का यह कर्तव्य है कि वह हिरासत में बंद व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, भले ही मृतक आपराधिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति रहा हो। सरकार हिरासत में बंद कैदियों की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने के अपने कर्तव्य से बच नहीं सकती।’’

अदालत ने कहा कि अधिकारियों की दलील के अनुसार दो 'प्रतिद्वंद्वी गिरोहों' के बीच झगड़ा हुआ और पीड़ित भी इसमें शामिल हुआ, लेकिन यह तथ्य कैदियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के कर्तव्य के पालन की जिम्मेदारी से अधिकारियों को मुक्त नहीं करता।

उच्च न्यायालय का मानना ​​था कि सरकार के कर्तव्यों में यह सुनिश्चित करना भी शामिल है कि ऐसे ‘‘गिरोहों’’ को जेलों में पनपने न दिया जाए। अदालत ने कहा कि निश्चित रूप से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस तरह की प्रतिद्वंद्विता सामने न आने दी जाए।

मुआवजे की मांग संबंधी याचिका शुरू में जावेद की मां ने दायर की थी। उन्होंने कहा था कि जावेद एक आपराधिक मामले में सात साल की कैद काट चुका था और पांच मई, 2013 को जेल से बाहर आने वाला था।

हालांकि, तीन मई 2013 को उन्हें अपने बेटे की मौत की सूचना मिली और इसका कारण स्पष्ट रूप से जेल में कैदियों के दो समूहों के बीच झगड़ा था।

जावेद की मां को एक लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा दिया गया था, लेकिन उनकी 2016 में मृत्यु हो गई।

इसके बाद, जावेद के भाई-बहनों और उनके बच्चों ने अदालत से इस आधार पर मुआवजे का अनुरोध किया वे उसपर (जावेद पर) निर्भर थे।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि जावेद की दुर्भाग्यपूर्ण मौत के लिए परोक्ष रूप से सरकार जिम्मेदार थी और उसे मुआवजा देना चाहिए।

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