देश की खबरें | याचिकाकर्ता की बेटी, नातिन के अफगान जेल से प्रत्यर्पण संबंधी अभिवेदन पर फैसला करे सरकार: न्यायालय
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को केरल के एक व्यक्ति के उस अभिवेदन पर फैसला करने के लिए कहा है, जिसमें अफगानिस्तान की पुल-ए-चरखी जेल में हिरासत में बंद उसकी बेटी और नाबालिग नातिन को भारत प्रत्यर्पित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
नयी दिल्ली, तीन जनवरी उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को केरल के एक व्यक्ति के उस अभिवेदन पर फैसला करने के लिए कहा है, जिसमें अफगानिस्तान की पुल-ए-चरखी जेल में हिरासत में बंद उसकी बेटी और नाबालिग नातिन को भारत प्रत्यर्पित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह वी जे सेबैस्टियन फ्रांसिस के अभिवेदन पर आठ सप्ताह में फैसला करे।
एर्नाकुलम जिला निवासी फ्रांसिस ने अपनी याचिका में कहा है कि राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने उसकी बेटी के खिलाफ अवैध गतिविधि (रोकथाम) कानून (यूएपीए) और अन्य अपराधों के तहत भारत में मामला दर्ज किया है।
उसने कहा कि आरोप है कि उसके दामाद ने उसकी बेटी और अन्य आरोपियों के साथ मिलकर एशियाई देशों के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए आतंकवादी संगठन आईएसआईएस का प्रचार करने के लिए षड्यंत्र रचा।
फ्रांसिस ने कहा कि अफगानिस्तान पहुंचने के बाद उसका दामाद युद्ध में मारा गया और उसकी बेटी तथा नातिन, जो लड़ाई में सक्रिय रूप से शामिल नहीं थी, को कई अन्य महिलाओं के साथ 15 नवंबर, 2019 को अफगान बलों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा था।
शीर्ष अदालत ने फ्रांसिस को अनुमति दी कि केंद्र के फैसले से असंतुष्ट होने पर वह आठ सप्ताह बाद केरल उच्च न्यायालय जा सकता है।
सुनवाई की शुरुआत में फ्रांसिस के वकील ने अभिवेदन दिया कि याचिका अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे से पहले पिछले साल जुलाई में दायर की गई थी। तालिबान ने पिछले साल अगस्त में अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया था।
याचिका में कहा गया है कि हालांकि तालिबान के सत्ता में आने के बाद कारागारों को नष्ट कर दिया गया, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि फ्रांसिस की बेटी और नातिन हिरासत में नहीं है, क्योंकि कैदियों को अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में हिरासत में रखे जाने की खबरें सामने आई हैं।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि इन सभी मामलों पर फैसला करने का अधिकार सरकार का है।
फ्रांसिस ने कहा कि उसकी बेटी और नातिन अफगानिस्तान में इस्लामी संगठन में शामिल होने के लिए 30 जुलाई, 2016 को भारत से चली गई थीं। याचिका में कहा गया है कि इंटरपोल ने उसकी बेटी के नाम पर 22 मार्च, 2017 को रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया था।
उसने कहा कि एक समाचार पोर्टल के साथ साक्षात्कार के दौरान उसकी बेटी ने आईएसआईएस में शामिल होने के अपने फैसले पर अफसोस जताया था और भारत लौटकर यहां सुनवाई का सामना करने की इच्छा व्यक्त की थी।
फ्रांसिस ने दावा किया कि भारत ने 2016 में अफगानिस्तान के साथ एक प्रत्यर्पण संधि की थी, लेकिन विदेश में फंसी उसकी बेटी और पोती के प्रत्यर्पण का अनुरोध करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।
याचिका में कहा गया है, ‘‘अफगानिस्तान में आईएसआईएस की हार के बाद से ... यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबान और अफगानिस्तान के इस्लामी गणराज्य के बीच युद्ध हो सकता है, जिसमें उनकी बेटी जैसे विदेशी आतंकवादी लड़ाकों को मौत की सजा दी जाएगी।’’
याचिका में बंदियों के प्रत्यर्पण के लिए केंद्र द्वारा कदम नहीं उठाए जाने को अवैध और असंवैधानिक घोषित करने का अनुरोध किया गया है क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
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