देश की खबरें | सरकार निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को नष्ट कर रही है : माकपा
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नयी दिल्ली, 10 अगस्त भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने बृहस्पतिवार को उस विधेयक पर सरकार की आलोचना की जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों के चयन के लिए समिति में प्रधान न्यायाधीश की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का प्रावधान है।
माकपा ने कहा कि यह निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को “नष्ट” कर देगा।
वाम दल ने सरकार पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर संविधान पीठ के फैसले को कमजोर करने का भी आरोप लगाया।
सरकार ने बृहस्पतिवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा की शर्तों और कार्यकाल के विनियमन के लिए राज्यसभा में एक विधेयक पेश किया। इस विधेयक में प्रावधान किया गया है कि भविष्य में निर्वाचन आयुक्तों का चयन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति द्वारा किया जाएगा जिसमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और एक कैबिनेट मंत्री शामिल होंगे।
उच्चतम न्यायालय ने मार्च में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था जिसका मकसद मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से बचाना है। न्यायालय ने फैसला दिया था कि उनकी (मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की) नियुक्तियां प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश की सदस्यता वाली एक समिति की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाएंगी। न्यायालय ने कहा था कि यह व्यवस्था तब तक रहेगी जब तक संसद द्वारा कानून नहीं बना दिया जाता।
माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा, “दिल्ली सरकार की शक्तियों पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को नकारने के बाद, मोदी सरकार ने अब प्रधान न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए कैबिनेट मंत्री को नियुक्त करके निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर एक और संविधान पीठ के फैसले को कमजोर कर दिया है!”
उन्होंने कहा, “ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी सरकार न्यायपालिका को अधीन बनाने के इजराइल की चरम दक्षिणपंथी सरकार के प्रयासों की नकल कर रही है। भारत का संविधान “स्वतंत्र और निष्पक्ष” चुनाव कराने के लिए एक निष्पक्ष निर्वाचन आयोग का आदेश देता है। यह कदम निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को नष्ट करता है।”
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