विदेश की खबरें | छह दशकों में वैश्विक स्तर पर 60 फीसदी से अधिक सिकुड़ा वनों का दायरा : अध्ययन

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. वैश्विक स्तर पर बीते 60 वर्षों में प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र में 60 फीसदी से अधिक की कमी दर्ज की गई है। ‘जर्नल एन्वार्यन्मेंटल रिसर्च लेटर्स’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है।

श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

तोक्यो, एक अगस्त वैश्विक स्तर पर बीते 60 वर्षों में प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र में 60 फीसदी से अधिक की कमी दर्ज की गई है। ‘जर्नल एन्वार्यन्मेंटल रिसर्च लेटर्स’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है।

अध्ययन टीम के मुताबिक, वनों का दायरा सिकुड़ने से जैव विविधता का भविष्य खतरे में पड़ गया है और दुनियाभर में रहने वाले 1.6 अरब लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है।

अध्ययन के अनुसार, 1960 से 2019 के बीच वैश्विक स्तर पर वन क्षेत्र में 8.17 करोड़ हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है। इस अ‍वधि में वन क्षेत्र में आई कमी वन क्षेत्र में हुई वृद्धि से कहीं ज्यादा है।

यह अध्ययन जापान स्थित फॉरेस्टरी एंड फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के अध्ययनकर्ताओं ने किया है। उन्होंने वैश्विक भू उपयोग डेटा का विश्लेषण कर समय के साथ वन क्षेत्र में आए बदलाव की जानकारी जुटाई है।

अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि पिछले छह दशकों में वैश्विक स्तर पर वन क्षेत्र आई कमी और आबादी में हुई वृद्धि के कारण प्रति व्यक्ति उपलब्ध वन क्षेत्र में 60 फीसदी से अधिक गिरावट दर्ज की गई है। यह 1960 में 1.4 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति से घटकर 2019 में 0.5 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति हो गया है।

अध्ययनकर्ताओं ने कहा, “जंगलों का लगातार कम होना और उसे नुकसान पहुंचाया जाना वन पारिस्थितिकी के अस्तित्व को प्रभावित करता है, जिससे आवश्यक सेवाएं प्रदान करने और जैव विविधता को बनाए रखने की उनकी क्षमता घट जाती है।”

उन्होंने कहा, “इससे दुनियाभर में रह रहे कम से कम 1.6 अरब लोगों का जीवन भी प्रभावित होता है, खासकर विकासशील देशों के लोगों का, जो विभिन्न उद्देश्यों के लिए वनों पर निर्भर हैं।”

अध्ययन में यह भी पाया गया कि वनों को नुकसान मुख्य रूप से उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के निम्न-आय वाले देशों में पहुंच रहा है, जबकि अतिरिक्त उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के उच्च-आय वाले देशों में वन क्षेत्र में वृद्धि हो रही है।

अध्ययन दल की अगुवाई करने वाले रोनाल्ड सी एस्टोक ने कहा, “वनों को नुकसान भले ही मुख्य रूप से कम विकसित देशों में पहुंच रहा हो, लेकिन इसमें अमीर देशों की भूमिका के बारे में भी और गहराई से अध्ययन किए जाने की जरूरत है।”

अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक, वनों की निगरानी वैश्विक स्तर पर चलाई जा रही विभिन्न सामाजिक एवं पर्यावरणीय पहलों का अहम हिस्सा है, जिनमें सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी), पेरिस जलवायु समझौता और 2020 के बाद का वैश्विक जैव विविधता ढांचा शामिल है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि इन पहलों में निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए दुनियाभर के जंगलों के संरक्षण पर ध्यान देकर वन क्षेत्र में हो रही कमी को रोके जाने का प्रयास करने की जरूरत है।

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