देश की खबरें | मत की अभिव्यक्ति अदालत की अवमानना ​​नहीं : प्रशांत भूषण ने न्यायालय में कहा
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, तीन अगस्त वकील प्रशांत भूषण ने उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस के जवाब में सोमवार को कहा कि मत की अभिव्यक्ति से अदालत की अवमानना नहीं हो सकती भले ही वह ‘कुछ लोगों के लिए अरूचिकर या अस्वीकार्य" हो।

न्यायालय ने 22 जुलाई को भूषण को नोटिस जारी किया था। न्यायालय ने न्यायपालिका के खिलाफ उनके दो कथित अपमानजनक ट्वीट को लेकर शुरू की गयी आपराधिक अवमानना ​​कार्यवाही पर पांच अगस्त को सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया था।

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न्यायालय ने उनके बयानों को प्रथम दृष्टया न्याय प्रशासन की छवि खराब करने वाला बताया था।

कार्यकर्ता व वकील भूषण ने वकील कामिनी जायसवाल के माध्यम से दायर 142 पृष्ठों वाले जवाबी हलफनामे में उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों, लोकतंत्र में "असंतोष को रोकने" तथा अदालत की अवमानना पर पूर्व तथा मौजूदा न्यायाधीशों के भाषणों का भी जिक्र किया। इसके अलावा उन्होंने कुछ मामलों में न्यायिक कार्रवाई पर अपने विचारों का भी उल्लेख किया है।

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भूषण अपने दोनों ट्वीट पर भी कायम रहे।

उन्होंने दलील दी, ‘‘"प्रतिवादी (भूषण) का कहना है कि उनके मत की अभिव्यक्ति, भले ही कुछ के लिए असहनीय या अरूचिकर हो, अदालत की अवमानना ​​नहीं कर सकती है। यह बात उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों और ब्रिटेन, अमेरिका तथा कनाडा जैसे विदेशी न्यायालयों में कही गयी है।’’

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी जिक्र किया और कहा कि यह अधिकार उन सभी मूल्यों का अंतिम संरक्षक है जिन्हें संविधान पवित्र मानता है।

उन्होंने कहा कि संविधान द्वारा स्थापित किसी संस्था पर सार्वजनिक हित में किसी नागरिक को ‘‘उचित मत' व्यक्त करने से रोकना उचित प्रतिबंध नहीं है और यह उन बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है जिन पर हमारा लोकतंत्र स्थापित है।

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