देश की खबरें | पराली जलाने से रोकने के लिए किसानों को नकद प्रोत्साहन के प्रस्ताव पर विशेषज्ञ विभाजित
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए नकद प्रोत्साहन देने के प्रस्ताव पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। उनका कहना है कि राज्य पूसा बायो-डीकंपोजर के इस्तेमाल को क्यों नहीं बढ़ा रहा है जिसे दिल्ली सरकार ने पहले पराली जलाने का किफायती समाधान बताया था।
नयी दिल्ली, एक अगस्त किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए नकद प्रोत्साहन देने के प्रस्ताव पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। उनका कहना है कि राज्य पूसा बायो-डीकंपोजर के इस्तेमाल को क्यों नहीं बढ़ा रहा है जिसे दिल्ली सरकार ने पहले पराली जलाने का किफायती समाधान बताया था।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पिछले हफ्ते कहा था कि पंजाब सरकार ने वायु गुणवत्ता प्रबंधक आयोग को एक प्रस्ताव भेजा है जिसमें कहा गया है कि सीमावर्ती राज्य में किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए नकद प्रोत्साहन दिया जाए।
प्रस्ताव कहता है कि दिल्ली और पंजाब को 500-500 रुपये देने चाहिए जबकि केंद्र 1500 रुपये मुहैया कराए।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वायु प्रयोगशाला के पूर्व प्रमुख दिपांकर साहा ने कहा, “नकद प्रोत्साहन देना समस्या का अस्थायी समाधान है। अन्य तरीकों में बॉयलर में और कागज बनाने के लिए धान के पुआल का इस्तेमाल करना बेहतर उपाय है। यथा-स्थान प्रबंधन एकमात्र स्थायी समाधान है जो मिट्टी की उर्वरता में सुधार करने में भी मदद करेगा।”
उन्होंने कहा कि आज दुनिया में लोग अपशिष्ट से भी पैसा कमा लेते हैं और “ हमें पता होना चाहिए कि इसका (पराली का) कैसे उपयोग किया जाए ... इसे उर्वरक में कैसे परिवर्तित किया जाए।”
साहा ने कहा कि राज्य सरकारों को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के साथ मिलकर काम करना चाहिए,क्योंकि एंजाइम उपचार के जरिए ही पराली को खत्म किया जा सकता है।
पंजाब और हरियाणा में पराली जलाई जाती है जो अक्टूबर और नवंबर के बीच राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण को चिंताजनक स्तर तक ले जाने के लिए प्रमुख कारण है। किसान गेहूं और आलू की बुआई करने से पहले फसल के अवशेष को जल्दी से खत्म करने के लिए उसमें आग लगा देते हैं।
पंजाब में वार्षिक तौर पर करीब दो करोड़ टन पराली निकलती है।
केंद्र प्रायोजित योजना के तहत किसानों को पराली के यथास्थान प्रबंधन के लिए रियायती दर पर कृषि मशीनरी प्रदान की जाती है। किसानों का कहना है कि नकद प्रोत्साहन से उन्हें मशीनरी के संचालन में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की लागत को निकालने में मदद मिल सकती है।
पर्यावरणविद भावरीन कंधारी ने कहा कि मुफ्त में चीज़े देना कभी भी पराली जलाने की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है।
उन्होंने कहा, “ मुझे नहीं लगता कि पंजाब के पास किसानों को देने के लिए पैसा है। उन्होंने पहले भी इसकी कोशिश की थी, लेकिन वे असफल रहे थे। जमीनी हकीकत कुछ और है। सही बात यह है कि किसी नीति पर तुरंत काम शुरू किया जाए। फसल विविधीकरण पर काम करने की जरूरत है।”
कंधारी ने पूछा कि पंजाब और दिल्ली सरकारें पूसा बायो-डीकंपोजर में निवेश क्यों नहीं कर रहीं हैं जिसे दिल्ली की आम आदमी पार्टी नीत सरकार ने पराली जलाने का किफायती समाधान बताया था।
उन्होंने कहा कि अगर राज्य अब भी पराली को जलाने को रोकने के लिए नकद प्रोत्साहन का विकल्प चुन रहे हैं तो पूसा बायो-डीकंपोजर की कोई अहमियत नहीं है।
वर्ष 2020 में, आईएआरआई के वैज्ञानिकों ने पूसा बायो-डिकंपोजर बनाया था जो एक छिड़कने वाला पदार्थ है और यह 15-20 में पराली को खाद में तब्दील कर सकता है।
दिल्ली सरकार ने 2020-2021 में गैर बासमति चावल के खेतों में पराली से निपटने के लिए किसानों को यह पदार्थ मुफ्त में दिया था।
सरकार ने केंद्रीय जल मंत्रालय की कंसल्टेंसी कंपनी ‘वैपकोस’ को बायो-डीकंपोजर की प्रभावशीलता का ऑडिट करने के लिए कहा था।
ऑडिट के अनुसार, इसका इस्तेमाल करने वाले 90 प्रतिशत किसानों ने कहा कि समाधान अत्यधिक प्रभावी है।
‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ में विश्लेषक सुनील दहिया ने कहा कि पराली जलाने से रोकने का केवल एक ही समाधान नहीं हो सकता है और राज्यों को नकद प्रोत्साहन सहित विभिन्न विकल्पों पर काम करने की जरूरत है।
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