मुंबई, 23 अगस्त देश के शीर्ष राज्यों का सामाजिक कल्याण मद में खर्च चालू वित्त वर्ष में 10 साल के उच्चस्तर चार लाख करोड़ रुपये पर पहुंचने की उम्मीद है। यह इन राज्यों के संयुक्त सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 1.7 प्रतिशत बैठेगा। क्रिसिल ने बुधवार को एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया है।
घरेलू रेटिंग एजेंसी ने 11 राज्यों के बजट के विश्लेषण के बाद कहा कि सामाजिक कल्याण योजनाओं में 2017-18 और 2023-24 के बीच सालाना आधार पर संचयी वृद्धि दर 16 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। इन राज्यों की सभी प्रदेशों के सकल राज्य घरेलू उत्पाद में तीन-चौथाई हिस्सेदारी है।
क्रिसिल ने कहा कि वहीं इस अवधि के दौरान राजस्व प्राप्ति 11 प्रतिशत बढ़ी है।
रिपोर्ट में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और केरल को शामिल किया गया है।
रेटिंग एजेंसी ने यह भी कहा, ‘‘देश की जनसंख्या संबंधी स्थिति को ध्यान में रखते हुए सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिये आवंटन आवश्यक माना जाता है। लेकिन राजस्व में आनुपातिक वृद्धि के बिना इसमें लगातार बढ़ोतरी से लंबे समय में राज्यों के कर्ज की स्थिति पर असर पड़ सकता है।’’
क्रिसिल ने कहा कि वित्त वर्ष 2017-18 से पहले इस मद में खर्च जीएसडीपी का औसतन 1.2-1.3 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 1.7 प्रतिशत हो गया है।
रेटिंग एजेंसी के वरिष्ठ निदेशक अनुज सेठी ने कहा, ‘‘सामाजिक कल्याण योजना मद में खर्च में वृद्धि का कारण आबादी के लक्षित हिस्से को प्रत्यक्ष अंतरण, पेंशन और नकद प्रोत्साहन के रूप में दी जा रही सहायता है। इसके अलावा कुछ मामलों में चुनावी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिये भी इस मद में खर्च किया जा रहा है।’’
क्रिसिल ने कहा है, ‘‘सामाजिक कल्याण व्यय में शिक्षा, कृषि, सार्वजनिक स्वास्थ्य और अन्य प्रमुख क्षेत्रों पर व्यय शामिल नहीं है। इनका बजट अलग से निर्धारित किया जाता है।’’
एजेंसी ने कहा कि गैर-प्रतिबद्ध व्यय मदों में कुल राशि में सामाजिक कल्याण योजनाओं की हिस्सेदारी सबसे अधिक 13 प्रतिशत है। यह शिक्षा पर खर्च (10-11 प्रतिशत), बिजली (6-7 प्रतिशत), कृषि (6-7 प्रतिशत) और सार्वजनिक स्वास्थ्य (4-5 प्रतिशत) से ज्यादा है।
क्रिसिल के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 में गैर-प्रतिबद्ध व्यय में सामाजिक कल्याण योजनाओं की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत थी।
एजेंसी ने कहा कि वित्त वर्ष 2017-18 और वित्त वर्ष 2023-24 के बीच राजस्व प्राप्तियां औसतन 10-11 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ी हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्यों के लिये राजस्व घाटा बना हुआ है।
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