देश की खबरें | ‘खास प्रोटीन की कमी के कारण यूरोप और अमेरिका में एशिया के मुकाबले कोरोना वायरस का अधिक संक्रमण हुआ’

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नयी दिल्ली, नौ फरवरी कॉकेशियाई आबादी में फेफड़ों की रक्षा करने वाले प्रोटीन की कमी की वजह से हो सकता है यूरोप और उत्तर अमेरिका के लोगों में एशियाई लोगों के मुकाबले कोरोना वायरस का अधिक संक्रमण देखने को मिला ।

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार वायरस का म्यूटेंट स्वरूप लोगों को संक्रमित करने के नये रास्ते खोज सकता है।

‘इंफेक्शन, जेनेटिक्स एंड इवॉल्यूशन’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में डी614जी म्यूटेशन वाले कोरोना वायरस के दुनिया भर में प्रसार का विश्लेषण किया गया है। इस म्यूटेशन वाले वायरस से सबसे तेजी से उत्तरी अमेरिका और यूरोप के लोग संक्रमित हुए हैं।

उक्त म्यूटेशन वाला कोरोना वायरस इतनी तेजी से फैला कि जनवरी में जहां सिर्फ 1.95 प्रतिशत आबादी इससे संक्रमित थी, वहीं महज 10 सप्ताह में फरवरी से मार्च 2020 के बीच दुनिया भर में संक्रमितों की संख्या बढ़कर 64.11 प्रतिशत से ज्यादा हो गई।

पश्चिम बंगाल के कल्याणी स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जिनोमिक्स (एनआईबीएमजी) सहित अध्ययन में शामिल अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि वायरस के इस स्वरूप से पूर्वी एशिया की 50 प्रतिशत आबादी को संक्रमित होने में 5.5 महीने लगे जबकि यूरोप की आधी आबादी महज 2.15 महीने में और उत्तरी अमेरिका की 2.83 महीने में इससे संक्रमित हो गई थी।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के लोगों में प्रोटीन अल्फा-एंटी-ट्रिप्सिन (एएटी) की कमी एशिया के मुकाबले इन दोनों महाद्वीपों में संक्रमण के तेजी से फैलने के मुख्य कारकों में से एक है।

अध्ययन के लेखक एनआईबीएमजी के एन. के. बिस्वास ने कहा, ‘‘कोशिकाओं में प्रवेश करने के लिए कोरोना वायरस मानव कोशिका के एसीई2 रिसेप्टर और प्रोटीन की दो उपइकाइयों एस1, एस2 के जंक्शन पर एंजाइम टीएमपीआरएसएस2 के साथ बंध बनाता है, जिससे वायरस को कोशिका में प्रवेश करने का अवसर मिलता है।’’

बिस्वास ने पीटीआई- को बताया, ‘‘लेकिन स्पाइक प्रोटीन में डी614जी म्यूटेशन के कारण वायरस को कोशिशओं में प्रवेश करने में और मदद मिली।’’

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