देश की खबरें | नीतीश के राष्ट्रपति पद के ‘योग्य’ होने को लेकर बिहार के राजनीतिक गलियारे में एक बार फिर चर्चा

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पटना, 11 जून सबसे लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले नीतीश कुमार के देश के राष्ट्रपति पद के योग्य होने की बात को लेकर प्रदेश के राजनीतिक गलियारे में एक बार फिर चर्चा जोरों पर है।

कुछ महीने पहले इसको लेकर अटकलें नीतीश के स्पष्ट दावे के बाद थम गई थीं कि उनका इरादा राज्य में रहने और लोगों की सेवा करने का है। चुनाव आयोग द्वारा इस सप्ताह के शुरू में राष्ट्रपति चुनाव के लिये तारीखों की घोषणा के बाद एक बार फिर उनकी चर्चा हो रही है।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग), जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू भी शामिल है, द्वारा उम्मीदवार की आधिकारिक घोषणा अटकलों के मौजूदा दौर पर विराम लगा सकती है।

इस बीच जदयू नेता के प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने ‘‘राष्ट्रपति नीतीश कुमार’’ की चर्चा में शामिल होते हुए उनपर निशाना साधते हुए कहा, ‘‘हमने नीतीश कुमार को ‘‘पीएम मटेरियल’’ कहा था जब हमने उनकी पार्टी के साथ गठबंधन में राज्य में सरकार चलाई थी। लेकिन उन्होंने गठबंधन धर्म का पालन करने की कभी परवाह नहीं की’’।

तिवारी ने नीतीश के बारे में कहा कि उन्होंने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी का समर्थन राजग का हिस्सा न होते हुए भी किया था।

उन्होंने कहा, ‘‘नीतीश कुमार ने बिहारी गौरव के मुद्दे को विशेष रूप से जोड़कर कोविंद को दिए अपने समर्थन का बचाव किया था। कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग ने मीरा कुमार को मैदान में उतारा था, जिनका हमने समर्थन दिया था और जो वास्तव में बिहारी थीं और राज्य से लोकसभा के लिए चुनी गई थीं।”

राजद प्रवक्ता ने कहा कि अगर नीतीश वास्तव में ‘रायसीना हिल’ तक पहुंचे तो उन्होंने हमारे साथ अतीत में जो किया है उसके बावजूद हमें गर्व होगा क्योंकि वह एक बिहारी हैं। उन्होंने कहा, संदेह है कि क्या भाजपा जिसने उन्हें धीमा राजनीतिक जहर देना शुरू कर दिया है, ऐसा होने देगी।

तिवारी ने बिहार विधानसभा में नीतीश की पार्टी जदयू के संख्या बल में तेज गिरावट की ओर इशारा किया।

उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘भाजपा जो नीतीश कुमार को अपमानित होकर पदच्युत होते देखना चाहती है, क्या वह उन्हें राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में बर्दाश्त करेगी।”

तिवारी का इशारा भाजपा के साथ जदयू के पुराने लेकिन रस्साकसी भरे संबंधों की ओर था जो नरेंद्र मोदी के उदय के साथ और अधिक स्पष्ट हो गया।

कई राज्यों में शासन करने वाली भाजपा के पास लोकसभा में प्रचंड बहुमत है लेकिन फिर भी राष्ट्रपति पद के लिये अपनी पसंद के उम्मीदवार को जितवाने में उसे राजग के बाहर उससे सहानुभूति रखने वाले दलों के समर्थन पर निर्भर रहना होगा।

नीतीश के पुराने आलोचकों में से एक केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से शीर्ष पद के लिए उनकी (नीतीश की) योग्यता के बारे में पूछा गया तो उन्होंने यह कहते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि किसी भी पार्टी या गठबंधन ने अब तक अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है।

भाजपा नेता और राज्य मंत्री अमरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि राजग दो दशक पहले की तरह आश्चर्यचकित कर सकता है जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम को मैदान में उतारा था जिन्हें पार्टी लाइन से हटकर, वैचारिक विभाजन को तोड़ते हुए भारी समर्थन मिला था।

नीतीश के विश्वासपात्र माने जाने वाले उनकी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान में बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी ने कहा, ‘‘निस्संदेह हमारे नेता देश के किसी भी शीर्ष पद के लिए योग्य उम्मीदवार हैं। लेकिन योग्यता पर्याप्त नहीं है। क्या हम ऐसे योग्य लोगों को नहीं पाते जो एक अच्छी नौकरी पाने में भी असमर्थ रहे हैं।”

महाराष्ट्र के राकांपा नेता नवाब मलिक जिन्होंने 22 फरवरी को कहा था कि शरद पवार के नेतृत्व वाली उनकी पार्टी देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए जदयू नेता (नीतीश) का समर्थन करने के लिए तैयार है बशर्ते वे भाजपा के साथ संबंध तोड लें।

राकंपा नेता के उस बयान से उत्पन्न अटकलों पर 23 फरवरी को विराम लगाते हुए नीतीश ने कहा था, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे आश्चर्य है कि ऐसी बात कैसे उठी। हमारे मन में ऐसी कोई अकांक्षा नहीं है। इन सबसे मेरा कोई लेना देना नहीं है। कहीं कोई बात नहीं हुई है। न हमको ऐसी बातों में रूचि है और न ही मेरा समर्थन है।”

जदयू 16 लोकसभा सांसदों के साथ वर्तमान में केंद्र में भाजपा की सबसे बड़ी गठबंधन सहयोगी है।

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