देश की खबरें | दिल्ली उच्च न्यायालय ने सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार से अवमानना याचिका पर जवाब तलब किया
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नयी दिल्ली, 16 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक सहकारी समूह हाउसिंग सोसाइटी के कई मकान मालिकों की याचिका पर सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार से जवाब मांगा है।
द्वारका के सेक्टर-12 स्थित विमल कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी के विभिन्न मकान खरीदारों की ओर से दायर अवमानना याचिका पर न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने नोटिस जारी किया। अदालत ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए जा रहे आवश्यक कदमों पर प्रतिवादी (रजिस्ट्रार) को नोटिस जारी किया जाता है जिस पर एक दिसंबर 2022 तक जवाब देना होगा।’’
मकान मालिकों की ओर से पेश अधिवक्ता अभिषेक प्रसाद ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उच्च न्यायालय द्वारा 16 फरवरी के आदेश में पारित निर्देशों का सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार द्वारा पालन नहीं किया गया है। उन्होंने दलील दी, ‘‘याचिकाकर्ता जानबूझकर अवज्ञा और इस अदालत द्वारा पारित समयबद्ध निर्देश का पालन करने में प्रतिवादी की जानबूझकर निष्क्रियता के कारण वर्तमान याचिका दायर करने के लिए विवश हुए हैं।’’
मुख्य याचिका में मकान मालिकों ने तीन महीने के भीतर अपनी सदस्यता के साथ-साथ अन्य सदस्यों को नियमित करने का अनुरोध करते हुए अदालत का रुख किया था। उच्च न्यायालय ने पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद दो फरवरी को रजिस्ट्रार को तीन महीने के भीतर सदस्यता को नियमित करने के लिए याचिकाओं पर फैसला करने के निर्देश के साथ याचिका का निपटारा किया था।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने 2004 में सोसायटी में फ्लैट खरीदे थे और उन्हें शेयर प्रमाण पत्र जारी किए गए थे, जिसका मतलब था कि उन्हें उसी वर्ष सोसायटी द्वारा एक सदस्य के रूप में नामांकित किया गया था और संपत्ति पर उनका कब्जा है।
याचिका में कहा गया, ‘‘फ्लैट खरीदने के बाद याचिकाकर्ता यह जानकर हैरान रह गए कि उनकी सदस्यता प्रतिवादी/सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के पास रखे गए रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुई थी, क्योंकि सोसायटी ने याचिकाकर्ताओं को दिल्ली सहकारी समिति नियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना सदस्यों के रूप में नामांकित किया था।
मकान खरीदारों ने अपनी सदस्यता को नियमित करने का अनुरोध किया। हालांकि, रजिस्ट्रार के पास सदस्यता को नियमित करने का अधिकार होने के बावजूद और काफी समय से उनके पास आवेदन लंबित रहने पर भी कोई आदेश पारित करने में विफल रहे जिसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अदालत का रुख किया।
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