देश की खबरें | अदालत ने पर्यावरण विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति पर केंद्र से जवाब मांगा
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नयी दिल्ली, 16 दिसंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को थर्मल पावर और कोयला खनन परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने के लिए विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) में की गई नियुक्तियों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा।
मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय और ईएसी के चार सदस्यों को नोटिस जारी किया, जिनकी समिति में नियुक्ति का पर्यावरण कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा अधिकारी मनोज मिश्रा की याचिका में विरोध किया गया है।
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अधिवक्ता रित्विक दत्ता और सृष्टि अग्निहोत्री के माध्यम से दायर याचिका में मिश्रा ने थर्मल पावर और कोयला खनन परियोजनाओं के पर्यावरण मूल्यांकन के लिए ईएसी का गठन करने वाली मंत्रालय की 10 जुलाई की अधिसूचना को चुनौती देते हुए दावा किया है कि 15 सदस्यीय समिति में कोई विशेषज्ञ नियुक्त नहीं किया गया है।
उनकी याचिका के अनुसार, अधिसूचना से पता चलता है कि समिति में नौ गैर-अधिकारियों और छह अधिकारियों को नियुक्त किया गया है, लेकिन इनमें से पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) 2006 की अधिसूचना के तहत कोई विशेषज्ञ नहीं है।
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याचिका में दलील दी गई है कि ईआईए अधिसूचना में 'अधिकारियों' और 'गैर-अधिकारियों' का कोई संदर्भ नहीं दिया गया है ।
इसमें यह भी दावा किया गया है कि ईएसी के जिन चार सदस्यों की नियुक्तियों को याचिका में विशेष रूप से चुनौती दी गई है, वे 2006 ईआईए अधिसूचना में निर्धारित मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं और उनमें से दो का चयन गलत है क्योंकि वे कोयला खनन और कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों में कार्यरत सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के बोर्ड में सेवारत हैं ।
चार में से एक गुरुराज पी कुंदरगी को ईएसी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। याचिका के अनुसार जिसमें दावा किया गया है कि वह सार्वजनिक क्षेत्र की विभिन्न कंपनियों के बोर्ड में हैं, जिनमें से कुछ कोयला खनन या थर्मल पावर परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी मांग रहे हैं।
मिश्रा ने दलील दी है कि ऐसी कंपनियों के बोर्ड में सेवारत होने से कोई व्यक्ति ईएसी के सदस्य या अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए जाने वाले विशेषज्ञ नहीं बन जाता ।
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