न्यायालय ने सहायक शिक्षक की नियुक्ति मामले में उप्र सरकार से मांगा जवाब

शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार से कहा कि वह रिक्त स्थानों का विवरण और नियुक्तियों के लिये अपनाई गयी प्रक्रिया को सिलसिलेवार तरीके से एक चार्ट के माध्यम से स्पष्ट करे।

जमात

नयी दिल्ली, 21 मई उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के प्राथमिक स्कूलों में 69,000 सहायक शिक्षकों की नियुक्ति के लिये कटऑफ अंक की उच्च सीमा निर्धारित करने के राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा।

शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार से कहा कि वह रिक्त स्थानों का विवरण और नियुक्तियों के लिये अपनाई गयी प्रक्रिया को सिलसिलेवार तरीके से एक चार्ट के माध्यम से स्पष्ट करे।

न्यायमूर्ति उदय यू ललित, न्यायमूर्ति एम एम शांतनागौडार और न्यायमूर्ति विनीत सरन की पीठ हालांकि शुरू में उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती थी लेकिन बाद में उसने अपने आदेश में सुधार करके उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया। पीठ ने इस मामले की वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सुनवाई की।

पीठ ने कहा कि इस मामले में राज्य सरकार से विस्तृत जवाब की अपेक्षा है। पीठ ने इसके साथ ही उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षा मित्र एसोसिएशन तथा अन्य की याचिकाओं को इसके बाद छह जुलाई के लिये सूचीबद्ध कर दिया।

पीठ ने राज्य सरकार से यह भी जानना चाहा है कि इस परीक्षा के निर्धारित सामान्य श्रेणी के लिये 45 प्रतिशत अंक और आरक्षित वर्ग के लिये 40 प्रतिशत अंकों के कट ऑफ आधार में उसने बदलाव क्यों किया।

उप्र प्राथमिक शिक्षा मित्र और कई अन्य लोगों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के छह मई के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में अपील दायर की हैं।

इस मामले मे एक याचिकाकर्ता राम शरण मौर्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश की पीठ का आदेश उनके पक्ष में था लेकिन खंडपीठ का फैसला उनके खिलाफ है। उन्होंने कहा कि किसी भी परीक्षा के लिये कट ऑफ अंक परीक्षा संपन्न होने के बाद निर्धारित नहीं किये जा सकते। इन अंकों का निर्धारण परीक्षा से पहले करना होता है। अत: यह प्रक्रिया पूरी तरह गलत है।

रोहतगी ने यह भी कहा कि यह विषय संविदा के स्वरूप और नियुक्ति प्रक्रिया में लगातार किये गये बदलाव से भी जुड़ा है। उन्होंने कहा कि छह जनवरी, 2019 को परीक्षा संपन्न होने के बाद सामान्य श्रेणी के लिये कटऑफ अंक 65 प्रतिशत और आरक्षित वर्ग के लिये 60 प्रतिशत कर दिये गये जबकि पहले ये 45 और 40 प्रतिशत थे।

इस पर पीठ ने रोहतगी से कहा कि कुछ शिक्षा मित्र परीक्षार्थी कट ऑफ अंक तक नहीं पहुंच सके थे लेकिन कुछ के पास तो अपेक्षित अंक भी नहीं थे।

रोहतगी ने कहा कि शिक्षा मित्रों का वेतन बहुत ही कम है और अगर कट ऑफ अंक 45 तथा 40 फीसदी निर्धारित किये जाते हैं तो अनेक लोगों को नौकरी मिल सकती है।

पीठ ने कहा कि वह इस मामले को विस्तार से सुनना चाहती है क्योंकि इसमें बहुत सारे वकील पेश हो रहे हैं और वीडियो कांफ्रेन्सिग के माध्यम से ऐसा संभव नहीं होगा।

पीठ ने इसके साथ ही इस मामले की सुनवाई स्थगित करते हुये कहा कि न्यायालय की सामान्य कार्यवाही शुरू होने पर इस मामले में विचार किया जायेगा। न्यायालय ने इस मामले में किसी प्रकार का अंतरिम आदेश देने या यथास्थिति बरकरार रखने के बारे में कोई आदेश देने से इंकार कर दिया।

इस मामले में शिक्षा मित्रों के एक अन्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन, दुष्यंत दवे, सीए सुंदरम और कई अन्य वकील पेश हुये। इन वकीलों ने सुनवाई स्थगित करने पर आपत्ति की और कहा कि न्यायालय को इस पर अभी सुनवाई करनी चाहिए क्योंकि यह मामला लाखों लोगों को प्रभावित कर रहा है।

धवन ने कहा कि पहले निर्धारित कट ऑफ अंक के आधार पर परीक्षा के नतीजों की फिर से गणना की जानी चाहिए।

राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से पीठ ने सवाल किया कि परीक्षा संपन्न होने के बाद नियमों और कट ऑफ अंकों में बदलाव क्यों किया गया।

इस पर मेहता ने कहा कि उन्हें आवश्यक निर्देश प्राप्त करने होंगे लेकिन ये लोग (शिक्षा मित्र) मेधावी प्रत्याशियों की पीठ पर सवार होना चाहते हैं।

पीठ ने कहा कि मेहता को इस मामले में छह जुलाई से पहले अपना जवाब दाखिल करना चाहिए।

अनूप

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