देश की खबरें | यौन उत्पीड़न के मामले में जारी नोटिस रद्द करने का न्यायाधीश का अनुरोध न्यायालय ने ठुकराया

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने महिला न्यायिक अधिकारी के कथित यौन उत्पीड़न के मामले में कारण बताओ नोटिस और इसके बाद शुरू हुयी कार्यवाही रद्द करने के लिये मध्य प्रदेश जिला न्यायाधीश की याचिका पर बृहस्पतिवार को विचार करने से इंकार कर दिया।

नयी दिल्ली, 25 जून उच्चतम न्यायालय ने महिला न्यायिक अधिकारी के कथित यौन उत्पीड़न के मामले में कारण बताओ नोटिस और इसके बाद शुरू हुयी कार्यवाही रद्द करने के लिये मध्य प्रदेश जिला न्यायाधीश की याचिका पर बृहस्पतिवार को विचार करने से इंकार कर दिया।

न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति सूर्य कांत की पीठ ने जिला न्यायाधीश को याचिका वापस लेने और कानून के तहत उपलब्ध दूसरे विकल्प अपनाने की छूट प्रदान कर दी।

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जिला न्यायाधीश की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और आर बालासुब्रमणियन ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के प्रिंसिपल रजिस्ट्रार द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी। दावा किया जा रहा है कि याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर पदोन्नति के लिये विचारणीय नामों में शामिल है।

पीठ ने कहा कि यह याचिका अनुच्छेद 32 के तहत दायर करने योग्य नहीं है।

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जिला न्यायाधीश ने अधिवक्ता सचिव शर्मा के माध्यम से दायर याचिका में कहा है कि वह लैंगिक संवेदनशीलता और आंतरिक शिकायत समिति की अंतिम रिपोर्ट तथा इसके बाद उच्च न्यायालय द्वारा उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिये जारी कारण बताओ नोटिस को चुनौती दे रहे हैं। याचिका में अतिम रिपोर्ट को मनमाना और गैरकानूनी बताया गया है।

याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता का 32 साल से अधिक सेवाकाल का रिकार्ड बेदाग रहा है। याचिकाकर्ता 2020 के अंत में अवकाश ग्रहण करने वाला है और वह अपनी सेवा के अंतिम चरण में है।

याचिका में कहा गया है कि सारी कार्रवाई मनमानी और दुर्भावनापूर्ण है और यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है क्योंकि विभिन्न चरणों में हुई जांच और बयान दर्ज करने की कार्यवाही में याचिकाकर्ता की भागीदारी ही नहीं है।

जिला न्यायाधीश ने आरोप लगाया है कि ये सारी कार्रवाई ऐसे समय में की गयी है जब उसका नाम उच्च न्यायालय में न्यायाधीश पद पर पदोन्नति के लिये विचारणीय है और इस मामले में कार्रवाई को दो साल से भी ज्यादा समय तक लंबित रखा गया ताकि उसके करियर की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाया जा सके।

याचिका में कहा गया है कि आंतरिक शिकायत समिति ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून, 2013 की धारा 10 के प्रावधानों को नजरअंदाज करते हुये शिकायतकर्ता की समझौते की अर्जी को अस्वीकार कर दिया।

याचिका में दलील दी गयी है कि आंतरिक शिकायत समिति ने उस आवेदन को इस तरह अस्वीकार किया माना वह खुद कानून के तहत अदालत हो जबकि कानून में प्रावधान है कि शिकायतकर्ता द्वारा समझौते के लिये आवेदन दायर करने की स्थिति में समिति समझौते को दर्ज करेगी।

अनूप

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