देश की खबरें | न्यायालय ने चुनावी बॉन्ड के जरिए प्राप्त धन के संभावित दुरुपयोग का मामला उठाया

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नयी दिल्ली, 24 मार्च उच्चतम न्यायालय ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी बॉन्ड के जरिए प्राप्त की जाने वाली निधि के आतंकवाद जैसे अवैध कार्यों में संभावित इस्तेमाल का बुधवार को मामला उठाया और केंद्र से सवाल किया कि क्या इन निधियों के इस्तेमाल के तरीकों पर किसी प्रकार का ‘‘नियंत्रण’’ है।

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अगुवाई वाली पीठ ने अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल से कहा कि सरकार को चुनावी बॉन्ड के जरिए प्राप्त धन के आतंकवाद जैसे अवैध कार्यों में दुरुपयोग की संभावना के मामले पर गौर करना चाहिए।

न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यन भी इस पीठ में शामिल हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘इस धन का इस्तेमाल कैसे होता है, इस पर सरकार का क्या नियंत्रण है?’’

एक एनजीओ ने न्यायालय में मंगलवार को एक याचिका दाखिल कर केंद्र और अन्य पक्षों को यह निर्देश देने का अनुरोध किया था कि राजनीतिक दलों के वित्तपोषण और उनके खातों में पारदर्शिता की कथित कमी से संबंधित एक मामले के लंबित रहने के दौरान और आगामी विधानसभा चुनाव से पहले चुनावी बॉन्ड की आगे और बिक्री की अनुमति नहीं दी जाए।

न्यायालय ने इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान सवाल किया कि मान लीजिए कि यदि कोई राजनीतिक दल चुनावी बॉन्ड से नकद राशि प्राप्त करना चाहता है और किसी विद्रोह को वित्तीय मदद देना चाहता है, तो सरकार का इसके इस्तेमाल पर क्या नियंत्रण है?

पीठ ने कहा, ‘‘इस धन का आतंकवाद जैसे अवैध कार्यों में इस्तेमाल किया जा सकता है। हम चाहते हैं कि आप सरकार के तौर पर इस पहलू पर गौर करें।’’

उसने कहा कि राजनीतिक दल अपने राजनीतिक एजेंडे से परे की गतिविधियों के लिए इन निधियों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘यदि राजनीतिक दल 100 करोड़ रुपए के चुनावी बॉन्ड हासिल करते हैं, तो इस बात का क्या भरोसा है कि इसे किसी अवैध मकसद या हिंसात्मक गतिविधियों को मदद देने में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।’’

उसने साथ ही कहा कि वह राजनीति में दखल नहीं देना चाहती और ये टिप्पणियां किसी विशेष राजनीतिक दल के लिए नहीं की गई हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘मान लीजिए कि यदि कोई कारोबारी या कोई और व्यक्ति चुनावी बॉन्ड खरीदने जाता है, तो क्या उसे यह खुलासा करना होगा कि यह वैध सम्पत्ति है और क्या उसे कर देना होगा?’’

वेणुगोपाल ने कहा कि खरीदार को वैध धन का इस्तेमाल करना होगा और चुनावी बॉन्ड की खरीदारी बैंकिंग माध्यम से होगी।

उन्होंने कहाा, ‘‘आतंकवाद को वैध धन से वित्तीय मदद नहीं दी जाती। इसे काले धन के जरिए मदद दी जाती है।’’

याचिकाकर्ता एनजीओ ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि चुनावी बॉन्ड की आगे और बिक्री की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

जब भूषण ने कहा कि आजकल चुनाव धन से व्यापक स्तर पर प्रभावित होते हैं, पीठ ने कहा, ‘‘अधिकतर लोग यह जानते हैं कि चुनाव में धन की क्या भूमिका है।’’

भूषण ने जब दलील दी कि चुनावी बॉन्ड जारी करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, पीठ ने वेणुगोपाल से पूछा कि क्या ये बॉन्ड जारी किए जाएंगे।

वेणुगोपाल ने कहा कि ये एक अप्रैल से 10 अप्रैल के बीच जारी किए जाएंगे।

भूषण ने कहा कि चंदा देने वाले अज्ञात हैं और निर्वाचन आयोग एवं भारतीय रिजर्व बैंक इस पर पहले आपत्ति जता चुके हैं।

उन्होंने दावा किया कि चुनावी बॉन्ड के जरिए प्राप्त अधिकतर निधि सत्तारूढ़ पार्टी के पास गई है।

पीठ ने कहा कि चुनावी बॉन्ड के जरिए प्राप्त निधि किसी भी राजनीतिक दल के पास जा सकती है।

एनजीओ ने याचिका में दावा किया है कि इस बात की गंभीर आशंका है कि पश्चिम बंगाल और असम समेत कुछ राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चुनावी बॉन्ड की आगे और बिक्री से ‘‘मुखौटा कंपनियों के जरिये राजनीतिक दलों का अवैध और गैरकानूनी वित्तपोषण और बढ़ेगा।’’

शीर्ष अदालत ने पिछले साल 20 जनवरी को 2018 की चुनावी बॉन्ड योजना पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था और योजना पर रोक लगाने की एनजीओ की अंतरिम अर्जी पर केंद्र तथा चुनाव आयोग से जवाब मांगा था।

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