देश की खबरें | न्यायालय ने बिना शर्त क्षमायाचना के लिये भूषण को 24 अगस्त तक का समय दिया

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक ट्वीट के लिये क्षमा याचना से इंकार करने संबंधी अपने बगावती बयान पर पुनर्विचार करने और बिना शर्त माफी मांगने के लिये बृहस्पतिवार को 24 अगस्त तक का समय दिया। न्यायालय ने अवमानना के लिये दोषी ठहराये गये भूषण की सजा के मामले पर दूसरी पीठ द्वारा सुनवाई का उनका अनुरोध ठुकराया दिया है।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 20 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक ट्वीट के लिये क्षमा याचना से इंकार करने संबंधी अपने बगावती बयान पर पुनर्विचार करने और बिना शर्त माफी मांगने के लिये बृहस्पतिवार को 24 अगस्त तक का समय दिया। न्यायालय ने अवमानना के लिये दोषी ठहराये गये भूषण की सजा के मामले पर दूसरी पीठ द्वारा सुनवाई का उनका अनुरोध ठुकराया दिया है।

न्यायालय ने इस मामले में भूषण को दी जाने वाली सजा के सवाल पर सुनवाई पूरी करते हुये उनका यह अनुरोध भी अस्वीकार कर दिया कि इस फैसले के खिलाफ अभी दाखिल की जाने वाली पुनर्विचार याचिका पर निर्णय होने तक सुनवाई स्थगित कर दी जाये।

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न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि अगर भूषण बिना शर्त माफीनामा दाखिल करते हैं तो वह 25 अगस्त को इसपर सुनवाई करेगी।

भूषण को ‘लक्ष्मण रेखा’ का ध्यान दिलाते हुये शीर्ष अदालत ने सवाल किया कि इसे क्यों लांघा गया । साथ ही न्यायालय ने टिप्पणी की कि अवमानना के मामले में सजा पर बहस की सुनवाई के लिये इसे किसी दूसरी पीठ को सौंपने की बात करके ‘अनुचित’ कृत्य किया गया है।

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पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘मुख्य मामले में सजा के सवाल पर दलीलें सुनी जा चुकी हैं। आदेश सुरक्षित रखा गया। हमने अवमाननाकर्ता (भूषण) को बिना शर्त क्षमायाचना करने के लिये, यदि वह ऐसा चाहें, समय दिया है। इसे 24 अगस्त तक दाखिल किया जाये। यदि क्षमा याचना दाखिल होती है तो इस पर विचार के लिये मामले को 25 अगस्त को सूचीबद्ध किया जाये।’’

शीर्ष अदालत ने 14 अगस्त को प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक दो ट्वीट के लिये आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया था। न्यायालय ने कहा था कि इन ट्वीट को ‘जनहित में न्यायपालिका की कार्यशैली की स्वस्थ आलोचना के लिये किया गया’ नहीं कहा जा सकता।

न्यायालय की अवमानना के जुर्म में उन्हें अधिकतम छह महीने तक की कैद या दो हजार रुपए का जुर्माना अथवा दोनों की सजा हो सकती है।

पीठ ने भूषण से कहा, ‘‘हम आपको समय दे सकते हैं और बेहतर होगा अगर आप (भूषण) इस पर पुन:विचार करें। इस पर सोचें। हम आपको दो-तीन दिन का वक्त देंगे।’’ भूषण ने इन ट्वीट के लिये क्षमा याचना करने से इंकार कर दिया था।

भूषण ने अपने बयान में कहा, ‘‘मैंने किसी आवेश में असावधान तरीके से ये ट्वीट नहीं किये। मेरे लिये उन ट्वीट के लिये क्षमा याचना करना धूर्तता और अपमानजनक होगा, जो मेरे वास्तविक विचारों को अभिव्यक्त करते थे और करते रहेंगे।’’

कार्यकर्ता अधिवक्ता ने हालांकि कहा कि वह पीठ के सुझाव पर सोचेंगे। पीठ ने इस मामले को अब 25 अगस्त के लिये सूचीबद्ध कर दिया है।

पीठ ने कहा कि अगर गलती का अहसास होगा तो वह बहुत नरम हो सकती है।

यह महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू होने के कुछ मिनट बाद भूषण ने भी पीठ को संबोधित किया और महात्मा गांधी को उद्धृत किया। उनका प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन और दुष्यंत दवे कर रहे थे।

भूषण ने कहा, ‘‘मैं दया के लिए नहीं कहूंगा, मैं उदारता दिखाने की भी अपील नहीं करूंगा। मैं, इसलिए, अदालत द्वारा दी जा सकने वाली किसी भी उस सजा को सहर्ष स्वीकार करने के लिये यहां हूं, जो अदालत ने एक अपराध के लिये विधि सम्मत तरीके से निर्धारित की है और मुझे लगता है कि यह एक नागरिक का सर्वोच्च कर्तव्य है।'’

इस मामले में न्यायालय की मदद कर रहे अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने न्यायालय से अनुरोध किया कि अवमानना के मामले में भूषण को कोई सजा नहीं दी जाये क्योंकि उन्हें पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है। अनेक विधिवेत्ताओं ने भी उनका साथ दिया।

पीठ ने वेणुगोपाल से कहा, ‘‘भूषण के बयान के स्वर, भाव और विवरण मामले को और बिगाड़ने वाले हैं। क्या यह बचाव है या फिर आक्रामकता।’’

साथ ही पीठ ने स्पष्ट किया कि वह उनका अनुरोध उस समय तक स्वीकार नहीं कर सकती जब तक प्रशांत भूषण अपने ट्वीट के लिये क्षमा याचना नहीं करने के अपने रुख पर पुनर्विचार नहीं करते।

दो सितंबर को सेवानिवृत्त हो रहे न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा ने कहा कि न्यायाधीश के रूप अपने समूचे कार्यकाल के दौरान उन्होंने किसी भी व्यक्ति को अवमानना के लिये दंडित नहीं किया है और यह उनका पहला ऐसा फैसला है।

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा, ‘‘सभी के लिए एक लक्ष्मण रेखा है। इसे लांघें क्यों ? हम जनहित में अच्छे मामलों की सुनवाई कर रहे हैं लेकिन ध्यान रखें, यह दोषी ठहराने के बाद है। और यह गंभीर बात है। मैंने न्यायाधीश के रूप में अपने 24 साल के कार्यकाल के दौरान किसी को भी अवमानना का दोषी नहीं ठहराया है। यह इस तरह का मेरा पहला आदेश है।’’

कार्यवाही शुरू होते ही दुष्यंत दवे ने कहा कि इस मामले में दायर की जाने वाली पुनर्विचार याचिका पर फैसला होने तक सजा के सवाल पर सुनवाई स्थगित कर दी जाये या विकल्प के रूप में इस मामले को किसी दूसरी पीठ को सौंप दिया जाये।

सुनवाई टालने या मामला हस्तांतरित करने का कथन अस्वीकार करते हुये पीठ ने कहा, ‘‘आप सजा के सवाल पर बहस दूसरी पीठ द्वारा सुने जाने का आग्रह करके हमसे अनुचित कृत्य के लिये कह रहे हैं। क्या ऐसा कभी हुआ है कि मुख्य पीठ के रहते हुये किसी दूसरी पीठ ने सजा देने के सवाल पर सुनवाई की हो ?’’

पीठ ने भूषण को यह आश्वासन दिया कि उन्हें दोषी ठहराने के आदेश के खिलाफ उनकी पुनर्विचार याचिका पर निर्णय होने तक सजा पर अमल नहीं किया जायेगा।

पीठ ने सुनवाई स्थगित करने का आवेदन अस्वीकार कर दिया और कहा कि पुनर्विचार पर फैसला तो मौजूदा मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद ही किया जा सकता है।

पीठ ने कहा कि वह सजा के मुद्दे पर बहस सुनेगी और भूषण द्वारा बुधवार को दायर अवेदन पर सुनवाई नहीं करेगी, जिसमें पुनर्विचार याचिका पर फैसला होने तक सजा के सवाल पर सुनवाई टालने का अनुरोध किया गया है।

दवे ने पीठ से कहा कि सजा के सवाल पर सुनवाई निलंबित करने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा।

पीठ ने अटार्नी जनरल से कहा कि वह सजा के सवाल पर पहले भूषण को सुनेगी।

दवे ने जब यह कहा कि वेणुगोपाल को पहले बहस करने देनी चाहिए तो पीठ ने कहा, ‘‘हमें पेशेगत मानदंडों के बारे में ध्यान नहीं दिलायें।’’

भूषण ने न्यायालय को खुद संबोधित करते हुये कहा कि उन्हें ‘बहुत ही गलत समझा गया है।’’

शीर्ष अदालत ने 14 अगस्त को 108 पेज के फैसले में प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक दो ट्वीट के लिये आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया था। न्यायालय ने कहा था कि इन ट्वीट को ‘जनहित में न्यायपालिका की कार्यशैली की स्वस्थ आलोचना के लिये किया गया’ नहीं कहा जा सकता।

न्यायालय ने भूषण द्वारा माइक्रो ब्लॉगिंग साइट पर 27 जून को न्यायपालिका की पिछले छह साल की कार्यशैली के बारे में और 22 जुलाई को प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे के बारे में पोस्ट किये गये इन ट्वीट का विश्लेषण भी किया था।

अनूप

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