देश की खबरें | न्यायालय ने कुछ उच्च न्यायालयों में अधिकारियों को तत्काल तलब करने के चलन पर निराशा जताई

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि ‘‘अदालत के प्रति सम्मान अपने आप आना चाहिए, ये मांगा नहीं जाना चाहिए’’ और अधिकारियों को तलब करके सम्मान में वृद्धि नहीं हो जाती है। कुछ उच्च न्यायालयों द्वारा अधिकारियों को तुरंत तलब किये जाने के चलन के प्रति असहमति जताते हुए शीर्ष न्यायालय ने शुक्रवार को यह टिप्पणी की।

नयी दिल्ली, नौ जुलाई उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि ‘‘अदालत के प्रति सम्मान अपने आप आना चाहिए, ये मांगा नहीं जाना चाहिए’’ और अधिकारियों को तलब करके सम्मान में वृद्धि नहीं हो जाती है। कुछ उच्च न्यायालयों द्वारा अधिकारियों को तुरंत तलब किये जाने के चलन के प्रति असहमति जताते हुए शीर्ष न्यायालय ने शुक्रवार को यह टिप्पणी की।

न्यायालय ने कहा कि इन आदेशों से न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के विभाजन की जो रेखा है, उसे लांघना पड़ता है। शीर्ष अदालत ने शक्तियों के विभाजन के बारे में पहले के एक फैसले का जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि ‘‘न्यायाधीशों को अपनी सीमाएं पता होनी चाहिए। उन्हें शासकों की तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए बल्कि उनमें विनम्रता और दयालुता का भाव होना चाहिए।’’

वरिष्ठ अधिकारियों को तलब करने के चलन की निंदा के संबंध में टिप्पणी न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ के उस फैसले में आई, जिसमें सेवा के एक मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ की एकल पीठ और खंडपीठ के फैसलों को रद्द किया गया।

उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया था कि उत्तराखंड के एक स्थान से 6 मार्च, 2002 को तबादला किये जाने के बाद से 13 साल तक राज्य के बदायूं में अपने कार्यस्थल पर नहीं जाने वाले डॉक्टर मनोज कुमार शर्मा का पिछला 50 प्रतिशत वेतन दिया जाए।

न्यायमूर्ति गुप्ता ने पीठ के लिए फैसला लिखते हुए कहा, ‘‘कुछ उच्च न्यायालयों में अधिकारियों को तत्काल तलब करने और प्रत्यक्ष या परोक्ष दबाव बनाने का चलन विकसित हो गया है।’’

पीठ ने कहा कि कार्यपालिका के अधिकारी भी सरकार के अंग के रूप में अपना कर्तव्य निभा रहे हैं और अधिकारियों के फैसले या कार्रवाई उनके खुद के फायदे के लिए नहीं होते, बल्कि प्रशासन के हित में तथा सरकारी कोष के संरक्षक के रूप में कुछ फैसले लेने को विवश होना पड़ता है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘उच्च न्यायालय को ऐसे फैसले रद्द करने का हमेशा अधिकार है, जो न्यायिक समीक्षा पर खरा नहीं उतरते लेकिन बार-बार अधिकारियों को तलब करना बिल्कुल उचित नहीं है। इसकी कड़े से कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए।’’

न्यायमूर्ति गुप्ता ने फैसले में शीर्ष अदालत के इसी तरह के मामले में दिये गये पहले के एक आदेश का जिक्र किया और कहा कि उसके संज्ञान में यह तकलीफदेह बात आई है कि चिकित्सा स्वास्थ्य सचिव को उच्च न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा गया।

शीर्ष अदालत ने मामले में इस तथ्य का संज्ञान लिया कि डॉक्टर मनोज कुमार शर्मा ने अपना कैडर उत्तराखंड से बदलकर उत्तर प्रदेश कराया था और 2002 में उनका तबादला बदायूं कर दिया गया। वह 13 साल तक सेवा पर नहीं गये और उच्च न्यायालय ने इस अवधि के लिए उन्हें 50 प्रतिशत पिछला वेतन देने का आदेश दिया।

न्यायालय ने कहा, ‘‘उन्हें सबसे पहले जहां पदस्थापना दी गयी, वहां गए बिना वह अपनी पोस्टिंग की जगह नहीं बता सकते। इसलिए हमें लगता है कि उच्च न्यायालय के 5 मार्च 2020 और 7 अगस्त 2019 के आदेश पूरी तरह अनुचित, एकपक्षीय और अवैध हैं। उन्हें रद्द किया जाता है।’’

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