देश की खबरें | एलएसी पर भारतीय इलाके में चीन की निगरानी चौकी बनाने के कारण हुई झड़प

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में ऊंचाई वाले इलाके में एक संकीर्ण पहाड़ी रास्ते पर चीनी सेना द्वारा निगरानी चौकी स्थापित किए जाने की वजह से भारत और चीन की सेना के बीच हिंसक झड़प हुयी थी। इसमें 20 भारतीय सैन्यकर्मी शहीद हो गए थे।

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नयी दिल्ली, 17 जून पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में ऊंचाई वाले इलाके में एक संकीर्ण पहाड़ी रास्ते पर चीनी सेना द्वारा निगरानी चौकी स्थापित किए जाने की वजह से भारत और चीन की सेना के बीच हिंसक झड़प हुयी थी। इसमें 20 भारतीय सैन्यकर्मी शहीद हो गए थे।

घटनाक्रम की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने बुधवार को यह जानकारी दी। चीन ने समझौते का उल्लंघन कर वह चौकी बनायी थी।

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सूत्रों ने बताया कि दिवंगत कर्नल बी संतोष बाबू के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने गलवान नदी के दक्षिणी तट पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारतीय क्षेत्र में चौकी बनाने पर कड़ी आपत्ति जताई और सोमवार शाम को उसे हटाने का प्रयास किया। इसके बाद दोनों सेनाओं के बीच झड़प हुयी जो पिछले पांच दशक में सबसे बड़े सैन्य टकराव था।

शिविर में मौजूद चीनी जवानों के एक छोटे समूह ने भारतीय गश्ती दल की आपत्तियों पर नाराजगी व्यक्त की लेकिन जल्द ही वे चीनी क्षेत्र में लौट गए। बाद में वे अधिक सैनिकों के साथ लौटे। और वे पत्थरों, कील लगे डंडों, लोहे की छड़ों जैसे घातक हथियारों से लैस होकर लौटे तथा भारतीय सैनिकों से भिड़ गए।

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घटना की जानकारी रखने वालों के अनुसार भारत की ओर से भी अतिरिक्त सैनिक पहुंच गए और वे अस्थायी ढांचे को हटाने का प्रयास कर रहे थे।

उन्होंने बताया कि चीनी सैनिकों ने भारतीयों जवानों पर बर्बरता से हमला किया और यह झड़प कई घंटों तक चली।

इस दौरान सड़क का एक हिस्सा धंस गया और कुछ भारतीय तथा चीनी सैनिक गलवान नदी में गिर गए।

अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाके में हुयी इस झड़प में बाबू और 19 अन्य भारतीय जवान शहीद हो गए।

समझा जाता है कि शुरू में चीनी सैनिकों ने कई भारतीय जवानों को पकड़ लिया था लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।

भारतीय पक्ष ने भी दृढ़ता से जवाबी कार्रवाई की। लेकिन चीनी पक्ष के हताहतों की संख्या अभी तक ज्ञात नहीं है। हालांकि, सरकारी सूत्रों ने एक अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि मारे गए या गंभीर रूप से घायल हुए चीनी सैनिकों की संख्या 35 हो सकती है।

वर्ष 1967 में नाथू ला में झड़प के बाद दोनों सेनाओं के बीच यह सबसे बड़ा टकराव है। उस टकराव में भारत के करीब 80 सैनिक शहीद हुए थे और 300 से ज्यादा चीनी सैन्यकर्मी मारे गए थे।

छह जून को लेह स्थित 14वीं कोर के जनरल कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह और तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट के कमांडर मेजर जनरल लियू लिन के बीच बातचीत के दौरान गलवान घाटी से हटने का फैसला लिया गया।

सूत्रों ने कहा कि उस बैठक के बाद मेजर जनरल स्तरीय दो दौर की बातचीत हुयी।

शुक्रवार को मेजर जनरल स्तरीय बैठक में सैनिकों के हटने के लिए अंतिम तौर-तरीके तैयार किए गए। इसके तहत दोनों पक्षों को गलवान घाटी में अपनी मौजूदा स्थिति से कम से कम दो किलोमीटर पीछे हटना था।

अगले दिन यानी शनिवार को भारतीय थल सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे ने देहरादून में कहा कि दोनों सेनाएं गलवान घाटी से चरणबद्ध तरीके से हट रही हैं और क्षेत्र में स्थिति नियंत्रण में है।

विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को अपने बयान में झड़प के लिए चीनी पक्ष को दोषी ठहराया और कहा कि उसने गलवान घाटी में एलएसी का सम्मान करने पर बनी सहमति का पालन नहीं किया।

बयान में कहा गया कि 15 जून की देर शाम और रात में चीनी पक्ष द्वारा वहां की यथास्थिति को एकतरफा रूप से बदलने के प्रयास के परिणामस्वरूप हिंसक झड़प हुयी।

मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्षों के लोग हताहत हुए हैं और उच्च स्तर हुए समझौते का चीनी पक्ष द्वारा ईमानदारीपूर्वक पालन किया गया होता तो इसे टाला जा सकता था।

उसने कहा कि भारत का स्पष्ट रुख है कि उसकी सभी गतिविधियां हमेशा एलएसी के भारतीय इलाके में होती हैं।

गलवान और पूर्वी लद्दाख के कई अन्य क्षेत्रों में दोनों सेनाओं के बीच पांच मई से गतिरोध बना हुआ था जब दोनों पक्षों के बीच पैंगोंग सो के तट पर झड़प हुयी थी।

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