कोविड-19 की वजह से देशभर में स्टेम सेल उपचार को लेकर चुनौतीपूर्ण हालात
गुरुग्राम निवासी सोनिया घक्कर के पति ल्यूकेमिया के रोगी हैं और वह अपने पति का अस्थि मज्जा (बोन मैरो) प्रतिरोपण कराने के लिए मदद की आस लगाए बैठी हैं।
कोलकाता, नौ मई कोविड-19 महामारी के कारण अनेक लोगों की जीवन में तमाम दुश्वारियां आई हैं, वहीं ल्यूकेमिया जैसे गंभीर रक्त विकारों के रोगियों का जरूरी इलाज नहीं होने की वजह से उनके जीवन के लिए भी चुनौतियां बढ़ गयी हैं।
गुरुग्राम निवासी सोनिया घक्कर के पति ल्यूकेमिया के रोगी हैं और वह अपने पति का अस्थि मज्जा (बोन मैरो) प्रतिरोपण कराने के लिए मदद की आस लगाए बैठी हैं।
सोनिया ने बताया, ‘‘करीब दो महीने पहले मेरे पति को ल्यूकेमिया का पता चला। उनके जीवित रहने के लिए अस्थि मज्जा प्रतिरोपण ही एकमात्र विकल्प है। हमने रक्त स्टेम सेल मंगाने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय से अनुमति मांगी है लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।’’
रक्त संबंधी अनेक विकारों से ग्रस्त रोगियों के लिए स्टेम सेल प्रतिरोपण ही एकमात्र उपचार है।
एक रुधिर रोग विशेषज्ञ (हीमेटोलॉजिस्ट) के अनुसार स्टेम सेल का दानदाता खोजने में महीनों और कई बार तो कुछ साल भी लग जाते हैं और कई बार अत्यंत जोखिम वाले रोगियों के पास इतना वक्त नहीं होता।
लॉकडाउन के कारण देश के अनेक अस्पतालों ने प्रतिरोपण सर्जरी और अतिरिक्त कीमोथैरेपी जैसी पद्धतियों को अभी रोक रखा है।
मुंबई निवासी दानिश मर्चेंट की मार्च के अंत में अस्थि मज्जा प्रतिरोपण सर्जरी (बीएमटी) होनी थी लेकिन डॉक्टरों ने साजो-सामान संबंधी चुनौतियों का हवाला देते हुए इसे टाल दिया।
32 वर्षीय मर्चेंट ने कहा, ‘‘मैं अब कीमोथैरेपी पर निर्भर हूं। इससे न केवल मेरा बिल बढ़ रहा है बल्कि मैं कमजोर हो रहा हूं और डरा हुआ हूं। मेरी प्रार्थना है कि हालात जल्द से जल्द नियंत्रण में आएं और मेरी बीएमटी सर्जरी में बहुत ज्यादा देरी नहीं हो।’’
जानेमाने हीमेटोलॉजिस्ट और पद्मश्री से सम्मानित मेमन चांडी के अनुसार चिकित्सा संस्थान कुछ चुनिंदा प्रतिरोपण सर्जरी ही कर पा रहे हैं।
टाटा मेडिकल सेंटर, वेल्लूर के निदेशक चांडी ने फोन से पीटीआई- को बताया कि अस्पतालों में चुनिंदा सर्जरी हो रही हैं। बंद के कारण प्लेटलेट देने की प्रक्रिया भी धीमी हो गयी है।
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