देश की खबरें | आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद नवलखा को फोन सुविधा नहीं दे सकते: महाराष्ट्र सरकार

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. महाराष्ट्र सरकार ने बंबई उच्च न्यायालय से बुधवार को कहा कि वह सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा को जेल से फोन करने की अनुमति नहीं दे सकती, क्योंकि वह आतंकवाद के आरोपों का सामना कर रहे हैं।

मुंबई, 20 जुलाई महाराष्ट्र सरकार ने बंबई उच्च न्यायालय से बुधवार को कहा कि वह सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा को जेल से फोन करने की अनुमति नहीं दे सकती, क्योंकि वह आतंकवाद के आरोपों का सामना कर रहे हैं।

नवलखा एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में आरोपी हैं।

राज्य की ओर से पेश हुईं वकील संगीता शिंदे ने न्यायमूर्ति नितिन जामदार की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष वह प्रस्ताव रखा, जिसके तहत महाराष्ट्र सरकार ने इस साल 25 मार्च को ऐसी सुविधाओं पर रोक लगा दी थी।

राज्य के पुलिस महानिरीक्षक द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव के अनुसार, नवी मुंबई की तलोजा जेल सहित विभिन्न जेलों में कैदियों के लिए फोन कॉल करने के वास्ते एक ‘कॉइन बॉक्स’ सुविधा उपलब्ध है, जहां नवलखा और मामले के अन्य आरोपी विचाराधीन कैदी के रूप में बंद हैं।

हालांकि, प्रस्ताव में विचाराधीन कैदियों और दोषियों की 10 श्रेणियों को सूचीबद्ध किया गया है, जिन्हें ‘कॉइन बॉक्स’ सुविधा तक पहुंच प्रदान नहीं की जा सकती। इन 10 श्रेणियों में पहली श्रेणी उन विचाराधीन कैदियों की है जिन पर आतंकवाद या राष्ट्र-राज्य और सरकार के खिलाफ साजिश रचने का आरोप है।

एल्गार परिषद मामले में दायर राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) के आरोपपत्र के अनुसार, नवलखा और उनके सह-आरोपी एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन या ऐसे संगठनों का हिस्सा थे जो प्रतिबंधित संगठनों के लिए "मोर्चे" के रूप में काम करते थे।

आरोपपत्र में यह भी दावा किया गया है कि नवलखा और सह-आरोपियों ने केंद्र सरकार के "तख्तापलट" की साजिश रची।

नवलखा ने अपने वकील युग मोहित चौधरी के माध्यम से अपील दायर कर खुद के लिए जेल में फोन और वीडियो कॉल करने की अनुमति मांगी थी। शिंदे ने इसके जवाब में संबंधित प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

चौधरी ने बुधवार को यह भी तर्क दिया कि नवलखा को फोन कॉल की अनुमति न देना उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

शिंदे ने कहा, "उनके (नवलखा) के पास पत्र लिखने का विकल्प है और सभी कैदियों के लिए प्रत्यक्ष मुलाकात की भी अनुमति है।"

उच्च न्यायालय इस मामले में दो अगस्त को आगे की सुनवाई करेगा।

मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे के शनिवारवाड़ा में आयोजित 'एल्गार परिषद' सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से संबंधित है। पुलिस ने दावा किया था कि इसके चलते शहर के बाहरी इलाके में कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास अगले दिन हिंसा हुई थी।

पुणे पुलिस ने दावा किया था कि सम्मेलन को माओवादियों का समर्थन प्राप्त था।

बाद में, एनआईए ने मामले की जांच अपने हाथ में ले ली थी।

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)

Share Now

\