क्या पीरियड लीव महिलाओं के लिए भेदभाव का नया कारण बन सकती है?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने भारत में पीरियड लीव को लेकर पहले से जारी बहस को और तेज कर दिया है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने भारत में पीरियड लीव को लेकर पहले से जारी बहस को और तेज कर दिया है. हालांकि, जहां इसका प्रावधान है वहां भी इसका इस्तेमाल ना के बराबर होता है, इसका कारण समझते हैं.हाल की ही बात है जबसे भारतीय समाज में पीरियड्स पर पहले से खुलकर बात होने लगी है. ज्यादातर लोग अब इसे किसी बीमारी की तरह नहीं बल्कि एक सामान्य जैविक प्रक्रिया के रूप में समझने लगे हैं. लेकिन अब भी कई लोग मेंस्ट्रुएशन से गुजरने वाले नौकरीपेशा लोगों के लिए एक या दो दिन की अतिरिक्त पीरियड लीव का प्रावधान होने को 'गैरजरूरी' या 'विशेषाधिकार' मानते हैं.

हाल ही में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा कि अगर वे मेंस्ट्रुअल लीव से जुड़ा कानून बना देते हैं तो इससे महिलाओं के करियर पर असर होगा, उन्हें कोई नौकरी नहीं देना चाहेगा. मेंस्ट्रुअल लीव के विरोध में यह तर्क बार बार दिया जाता है कि अगर ये प्रावधान बना तो इससे कार्यस्थल पर पीरियड्स में छुट्टी लेने वालों के खिलाफ भेदभाव और बढ़ जाएगा. ध्यान देने वाली बात है कि प्रावधान बना देने के कारण होने वाले भेदभाव को लेकर कोई पुख्ता रिसर्च तो सामने नहीं आई है. लेकिन, यह जरूर है कि जहां यह सुविधा मिली हुई है वहां भी महिलाएं और लड़कियां इसका इस्तेमाल करने से कतराती हैं, और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह भेदभाव का डर होता है.

तमिलनाडु में 18 साल से अधिक उम्र की 955 छात्राओं पर 2023 में एक सर्वे हुआ. सर्वे में शामिल 82 फीसदी लोगों ने कहा कि मेंस्ट्रुअल लीव की पॉलिसी इस मुद्दे को सामान्य बनाने में मदद करेगी, कार्यस्थल पर उनके प्रदर्शन को भी बेहतर करने में मदद मिलेगी. हालांकि, उनकी चिंताएं भी थीं कि इससे वर्कप्लेस पर उनके जेंडर के आधार पर पहले से ही मौजूद स्टीरियोटाइप और मजबूत हो सकते हैं.

24 साल की वर्षा कहती हैं, "पीरियड्स के दौरान खासकर दूसरे दिन तो काम पर जाने का बिल्कुल मन नहीं होता. लेकिन अगर मेंस्ट्रुअल लीव मिलने भी लगी तो मुझे नहीं पता कि मैं कितना सहज महसूस करूंगी इसका इस्तेमाल करने में. मैं वर्कप्लेस पर कमजोर नहीं दिखना चाहती.” वर्षा पटना के एक प्राइवेट स्कूल में बतौर टीचर काम करती हैं और पढ़ाई भी कर रही हैं. उनका मानना है कि बस कानून बना देने से मेंस्ट्रुअल लीव लेना आसान नहीं हो जाएगा. वह यह भी कहती हैं कि किसी भी पीढ़ी के लोग हों, चाहे जेनजी हो या बूमर, पीरियड्स पर खुलकर बात करने में कोई खास फर्क नहीं आया है.

1920 के दशक से शुरू हुई बहस 2026 में कितनी बदली

मेंस्ट्रुअल लीव के प्रावधान से महिलाओं के खिलाफ भेदभाव बढ़ने का तर्क 1920 के दशक से ही दिया जा रहा है. सोवियत यूनियन ने 1922 में मांओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए महिला कामगारों के लिए दो से तीन दिनों की मेंस्ट्रुअल लीव पॉलिसी बनाई थी. लेकिन यह पॉलिसी पांच सालों के अंदर ही वापस ले ली गई थी. इसके पीछे पहली वजह थी कि महिलाएं इसका इस्तेमाल बिलकुल नहीं करती थीं. दूसरी वजह यह थी कि इस पॉलिसी के कारण कार्यस्थल पर उनके खिलाफ भेदभाव बढ़ने लगा था. कंपनियों को अपनी घटती प्रोडक्टिविटी की चिंता सताने लगी थी.

यह 1920 के दशक की बात है इसलिए उस दौरान पीरियड्स पर मौजूद रूढ़िवादी सोच को लेकर उतनी हैरानी नहीं होती. लेकिन करीब सौ साल बीत जाने के बाद भी यह रूढ़िवादी सोच मौजूद नजर आती है. जापान वह पहला देश था जहां 1947 में राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को मेंस्ट्रुअल लीव देने की शुरुआत हुई थी. हालांकि, ये छुट्टियां पेड होंगी या अनपेड यह साफ नहीं किया गया. 2020 की एक रिसर्च बताती है कि जापान की केवल 30 फीसदी कंपनियों ने ही महिलाओं को मेंस्ट्रुअल लीव की पूरी या आधी सैलरी दी. यहां 1 फीसदी से भी कम महिलाएं इस लीव का इस्तेमाल करती हैं. इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह भी कार्यस्थल पर भेदभाव बढ़ने का डर है.

दक्षिण कोरिया में, इन छुट्टियों का इस्तेमाल 2013 में 23 फीसदी के आसपास था जो 2017 में घटकर 19.7 फीसदी पर जा पहुंचा. पूरे यूरोपीय यूनियन में सिर्फ स्पेन में यह कानून मौजूद है और और इसका खर्च स्पेन की सरकार उठाती है. इसके बावजूद शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि 2.6 करोड़ से अधिक के वर्कफोर्स वाले स्पेन में हर दिन पांच से भी कम लोग इस छुट्टी का इस्तेमाल करते हैं.

मेंस्ट्रुअल लीव यानी करियर का नुकसान?

रंजीता प्रियदर्शिनी ‘पेड पीरियड लीव' की फाउंडर हैं. वह ओडिशा से हैं और मेंस्ट्रुअल लीव के अधिकार के लिए एक बड़ा अभियान चला रही हैं. साल 2022 में जब वे ओडिशा की मेटल इंडस्ट्री में काम कर रही थीं, तब एक दिन पीरियड्स के तेज दर्द की वजह से उन्होंने अपने बॉस से आधे दिन की छुट्टी मांगी. हिचक की वजह से उन्होंने 'पीरियड्स' शब्द का इस्तेमाल न करके इसे 'वीमन प्रॉब्लम' बताया. इस पर उनके बॉस ने यहां तक कह दिया कि अगर मेरा बस चलता तो मैं औरतों को काम पर ही नहीं रखता. साथ ही कहा कि सरकारों ने औरतों को कुछ ज्यादा ही अधिकार दे दिए हैं.

वह बताती हैं, "जब मैंने घर जाने की बात कही, तो उसे एक बहाना बताया गया और कहा कि इस्तीफा देकर चली जाओ. मैंने इस्तीफा देना मंजूर किया. ताज्जुब की बात यह थी कि मैं उस वक्त भी पीरियड्स के लिए जागरूकता का काम कर रही थीं. फिर भी उन्हें अपनी बात साबित करने के लिए मैं अपने बॉस को अपनी सीट दिखाने ले गई जिस पर खून लगा था.” आधे दिन की छुट्टी के लिए रंजीता को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी.

जेंडर के आधार पर कार्यस्थल पर मिलने वाले विशेषाधिकार अक्सर महिलाओं के करियर और आर्थिक विकास में सबसे बड़ी सजा बन जाते हैं. उदाहरण के तौर पर मैटरनिटी लीव लेने वाली महिलाओं को इन छुट्टियों के बदले एक पेनल्टी चुकानी पड़ती है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने इसे ‘मदरहुड पेनल्टी' का नाम दिया है. फोरम के मुताबिक 80 फीसदी जेंडर-पे गैप ‘मदरहुड पेनल्टी' के रूप में मौजूद है.

तमाम कोशिशों के बावजूद पीरियड्स आज भी एक निजी मुद्दा माना जाता है. मेंस्ट्रुअल लीव लेने का मतलब होता है काम करने की जगह पर अपने पीरियड्स पर होने की जानकारी साझा करना. रंजीता कहती हैं, "हैरान करने वाली बात यह है कि मेंस्ट्रुअल लीव के मुद्दे पर मुझे लड़कियों से ही विरोध का सामना करना पड़ा. मुझे कहा गया कि अगर मुझे छुट्टी चाहिए तो मैं लूं, दूसरों को खींचने की क्या जरूरत है. उन लड़कियों के अंदर हिचक थी कि अब उन्हें बताकर ‘पीरियड्स लीव' लेनी पड़ेगी.”

रूढ़िवादी सोच का नुकसान सिर्फ महिलाओं को नहीं

मेंस्ट्रुअल लीव के प्रावधान ना होने और इस मुद्दे पर असंवेदनशीलता के नुकसान अर्थव्यवस्था को भी उठाने पड़ते हैं. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ने 32,000 महिलाओं पर किए सर्वे में पाया कि पीरियड के दौरान या आसपास उससे जुड़े लक्षणों से गुजरने वाली महिलाएं 30 से 40 फीसदी कम कुशल महसूस कर रही थीं. अंग्रेजी में इसके लिए शब्द है - मेंस्ट्रुअल रिलेटेड प्रीसेंटीइज्म, यानी वह वक्त जब पीरियड्स के दौरान कम प्रोडक्टिव महसूस करते के बावजूद महिलाओं को प्रेजेंट रहना होता है. खासकर एंडोमेट्रिओसिस, प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर जैसी परेशानियों के साथ जीने वालों के लिए मेंस्ट्रुअल लीव का ना होना कामकाज को और मुश्किल बना देता है.

रंजीता ने साल 2024 में संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठाया और यूएन जनरल असेंबली के दौरान 40 देशों के प्रमुखों को मेमोरेंडम भी सौंपा. वे अब तक भारत के 24 राज्यों की सरकारों से मिल चुकी हैं और उन्हें 384 सांसदों का समर्थन भी मिला है. 2025 में जब कर्नाटक सरकार मेंस्ट्रुअल लीव का प्रावधान लेकर आई तो इसके पीछे भी रंजीता प्रियदर्शिनी की कोशिशें ही थीं. वह यह भी कहती हैं कि मेंस्ट्रुअल लीव का प्रावधान लाना सरकारों की जिम्मेदारी है ना कि अदालतों की. भेदभाव के डर से ऐसे प्रावधानों को ना लाना कोई समाधान नहीं है.

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