देश की खबरें | भूटिया, सीओए ने सुधारों का समर्थन किया, पटेल ने कहा कि एआईएफएफ में पद की कोई मंशा नहीं

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नयी दिल्ली, 22 अगस्त  भारत के पूर्व कप्तान एवं दिग्गज खिलाड़ी बाईचुंग भूटिया और प्रशासकों की समिति (सीओए) ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि फीफा (फुटबॉल की वैश्विक संचालन संस्था) की धमकियों के बावजूद राष्ट्रीय फुटबॉल निकाय एआईएफएफ में सुधार प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दी जानी चाहिए।

केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया कि भूटिया फुटबॉल में उस तरह के महान खिलाड़ी हैं जैसे सचिन तेंदुलकर या सुनील गावस्कर क्रिकेट में हैं । सरकार भारतीय फुटबॉल में उनके योगदान को देखते हुए उनके लिए एक बड़ी भूमिका पर विचार कर रही है। सरकार उन्हें समझाने की कोशिश करेगी कि उनका  एआईएफएफ (अध्यक्ष का पद) का मौजूदा लक्ष्य उनके कद के अनुकूल नहीं हो सकता है।

भूटिया ने  सीओए द्वारा तैयार किए गए अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) के मसौदा संविधान को अपनाये जाने की मांग के साथ शीर्ष न्यायालय का रुख किया। उन्होंने कहा कि 10 साल के अंदर भारत के लिए 100 से अधिक मैच खेलने के बाद भी मौजूदा स्थिति में उनके लिए देश के फुटबॉल प्रशासन में शामिल होना काफी मुश्किल है।

शीर्ष अदालत ने एआईएफएफ के फोरेंसिक ऑडिट  (अदालत की निगरानी में खातों की जांच) की एक अंतरिम और अंतिम रिपोर्ट भी मांगी, जिसमें कथित तौर पर प्रफुल्ल पटेल की अगुवाई वाली संचालन समिति द्वारा धन के हेराफेरी और घोटाले का संकेत मिला है।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वह फुटबॉल प्रशासन में भूटिया के कद के अनुसार उचित पद के लिए विचार करने के प्रस्ताव पर गौर करें।

भूटिया की ओर से पेश अधिवक्ता आर बसंत ने कहा कि उनकी एकमात्र चिंता देश में फुटबॉल प्रशासन में निहित स्वार्थ को दूर करना है।

बसंत ने भूटिया के हवाले से कहा, ‘‘मैंने फुटबॉल में भारत की कप्तानी की और दस साल की अवधि में 107 मैच खेले हैं। मैं एक महान खिलाड़ी हो सकता हूं लेकिन अगर मौजूदा सुधार प्रक्रिया को जारी नहीं रहने दिया जाता है तो मेरे पास इसके प्रशासन में आने का कोई मौका नहीं होगा।’’

उन्होंने कहा कि फीफा की आपत्तियों के बावजूद सुधारों के खेल के व्यापक हित में होने के कारण अदालत को मसौदा संविधान को लागू करने का निर्देश देना चाहिये।

पीठ ने उनसे पूछा कि अगर न्यायालय के ऐसे रूख से अंडर-17 महिला विश्व कप की मेजबानी छिन जाती है तो क्या होगा।

बसंत ने कहा कि चार साल पहले भारत ने अंडर-17 पुरुष विश्व कप की मेजबानी की थी लेकिन देश में इसका क्या असर पड़ा। भारत अभी भी खेल में विश्व में 104 वें स्थान पर है।

उन्होंने कहा, ‘‘ अगर आप एक छोटे बच्चे से पूछते हैं, तो वह आपको बताएगा कि भारत के फीफा विश्व कप के लिए क्वालीफाई करने का कोई मौका नहीं है। मैं अंडर-17 महिला विश्व कप का त्याग कर सुधारों को जारी रखने की कोशिश करुंगा। मेरा मुख्य लक्ष्य सीनियर स्तर के विश्व कप की मेजबानी करना है।

सीओए की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने स्पष्ट किया कि समिति का एआईएफएफ के प्रबंधन से ‘चिपके रहने’ का कोई इरादा नहीं है और यह अदालत का आदेश था जिसका वे पालन कर रहे थे।

पीठ ने शंकरनारायणन को इस मामले में न्याय मित्र बनने का सुझाव देते हुए कहा कि वह फोरेंसिक ऑडिट की एक प्रति अदालत को और दूसरी युवा मामलों और खेल मंत्रालय को सौंप सकते हैं।

मेहता ने कहा कि अगर अदालत निर्देश देती है तो खेल मंत्रालय कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार रिपोर्ट पर गौर करने के लिए तैयार है।

एआईएफएफ के पूर्व अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्हें राष्ट्रीय फुटबॉल निकाय में किसी भी पद पर रहने में कोई दिलचस्पी नहीं है। पटेल सिर्फ इतना चाहते हैं कि विश्व कप अधिकार भारत से वापस ना लिया जाये।

सिब्बल ने कहा, ‘‘मैं (पटेल) एआईएफएफ में कोई पद नहीं चाहता। मैंने विश्व कप की मेजबानी हासिल की है और चाहता हूं कि इसके आयोजन में कोई अड़चन ना आये।

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