देश की खबरें | असम के जनजातीय समुदायों को राष्ट्रपति मुर्मू से संवैधानिक अधिकारों को लेकर उम्मीद

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. असम में चाय-जनजातीय समुदाय और अन्य पिछड़े समूहों की उम्मीदें और आकांक्षाएं बुलंदियों पर हैं और वे संवैधानिक अधिकारों की पूर्ति तथा सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की तरफ देख रहे हैं। मुर्मू ने देश के 15वें राष्ट्रपति के रूप में सोमवार को शपथ ग्रहण की।

गुवाहाटी, 25 जुलाई असम में चाय-जनजातीय समुदाय और अन्य पिछड़े समूहों की उम्मीदें और आकांक्षाएं बुलंदियों पर हैं और वे संवैधानिक अधिकारों की पूर्ति तथा सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की तरफ देख रहे हैं। मुर्मू ने देश के 15वें राष्ट्रपति के रूप में सोमवार को शपथ ग्रहण की।

पूर्वोत्तर राज्य के सभी जनजातीय समूह मुर्मू के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन होने से उत्साहित हैं और चाय-जनजाति समुदाय के लोग आशान्वित हैं कि मुर्मू उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने के लिए कदम उठाएंगी।

असम में चाय-जनजाति समुदाय, जिसमें मुंडा, उरांव, संथाल, भूमिज और अन्य शामिल हैं, उन मजदूरों के वंशज हैं जिन्हें अंग्रेजों द्वारा चाय बागानों में काम करने के लिए छोटानागपुर पठार क्षेत्र से लाया गया था। लेकिन उन्हें झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ राज्यों में उनके बंधुओं की तरह अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं दिया गया।

आदिवासी राष्ट्रीय सम्मेलन समिति के सचिव बीर सिंह मुंडा ने कहा कि संवैधानिक प्रमुख के रूप में मुर्मू के पास यह सुनिश्चित करने की शक्ति है कि एसटी दर्जे को लेकर असम के आदिवासियों की लंबे समय से लंबित मांग पूरी हो। राज्य की आबादी का 12.45 प्रतिशत आदिवासी हैं।

ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन, असम (एएएसएए) के संस्थापक महासचिव जोसेफ मिंज ने कहा, ‘‘मुझे उम्मीद है कि असम के आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के लिए विधेयक पर राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे।’’

प्रमुख जनजातीय अधिवक्ता और अधिकार कार्यकर्ता श्याम टुडू ने कहा कि जनजातियों के पक्ष में वन कानूनों को सरल और संशोधित किया जाना चाहिए, क्योंकि उनमें से अधिकांश जंगल और इसके आसपास रहते हैं। उन्होंने कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी राज्य में जनजातीय समुदाय पिछड़े रहे, लेकिन उम्मीद है कि अब स्थिति में सुधार होगा।

अधिकार कार्यकर्ता ने यह भी कहा कि वे उम्मीद करते हैं कि वह यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएंगी कि जनजातियों के रीति-रिवाजों और परंपराओं को संरक्षित किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी अपने समाज और संस्कृति पर गर्व कर सके।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के एक प्रमुख चाय-जनजाति नेता पबन सिंह घटोवर ने कहा, ‘‘उनका चुनाव केंद्र और राज्य सरकारों के लिए 11 करोड़ जनजातीय लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाने में मददगार होगा।’’

प्रमुख चाय-जनजाति के नेता और असम के अखिल आदिवासी छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष राफेल कुजूर ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि राष्ट्रपति पद दलित लोगों और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए काम करेंगी।

उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि वह जनजातीयों के लिए समानता, न्याय और शांति सुनिश्चित करेंगी, ताकि वे समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें।

राज्य की अन्य जनजातियों जैसे बोडो, मिशिंग, दिमासा, कारबिस, सोनोवाल, राभा और हाजोंग समुदाय के लोगों ने खुशी व्यक्त करते हुए उम्मीद जताई कि मुर्मू जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार करने में मदद करेंगी।

बोडो साहित्य सभा के सचिव ज्वंगसर नारजारी ने कहा कि मुर्मू का देश का राष्ट्रपति बनना “सभी जनजातीयों के लिए सम्मान की बात” है। यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी के लिबरल नेता मरियम टोप्पो ने कहा कि शीर्ष संवैधानिक पद के लिए मुर्मू के चुनाव ने दुनियाभर की जनजातीयों और महिलाओं की गरिमा को बढ़ाया है।

प्रमुख कार्बी लेखिका और पद्म श्री से सम्मानित धनेश्वर एंगती ने कहा, ‘‘देश के सभी जनजातीय लोग आशान्वित हैं कि वह समुदाय की मनोदशा और आकांक्षाओं को समझेंगी और उन्हें साकार करने में सकारात्मक भूमिका निभाएंगी।’’

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