जरुरी जानकारी | एआईएसटीए का चीनी एमएसपी, एथनॉल की कीमतों में संशोधन का आग्रह

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नयी दिल्ली, दो मई चीनी व्यापार संगठन अखिल भारतीय चीनी व्यापार संघ (एआईएसटीए) ने सरकार से बढ़ती उत्पादन लागत और चीनी मिलों पर पड़ रहे आर्थिक दबाव के मद्देनजर चीनी के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तथा एथनॉल की कीमतों में संशोधन करने का शुक्रवार को आग्रह किया।

फरवरी 2019 से चीनी का एमएसपी 31 रुपये प्रति किलोग्राम पर यथावत बना हुआ है। यहां तक ​​कि गन्ने के रस व ‘बी-हैवी’ शीरा से बने एथनॉल की (एक्स-मिल) कीमत भी 2023-24 से क्रमशः 65.60 रुपये प्रति लीटर तथा 60.70 रुपये प्रति लीटर पर अपरिवर्तित रखी गई।

हालांकि, गन्ने का समर्थन मूल्य या उचित व लाभकारी मूल्य (एफआरपी) हर वर्ष बढ़ाया जाता रहा है। अक्टूबर से शुरू होने वाले आगामी 2025-26 सत्र के लिए इसे 15 रुपये बढ़ाकर 355 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है।

अखिल भारतीय चीनी व्यापार संघ (एआईएसटीए) के चेयरमैन प्रफुल विठलानी ने बयान में कहा, ‘‘ किसानों, उपभोक्ताओं, एथनॉल कार्यक्रम और वित्तीय संस्थानों, जिन्होंने चीनी उद्योग में भारी निवेश किया है... उनके हित में चीनी के एमएसपी तथा एथनॉल की कीमतों को उत्पादन की मौजूदा लागत के अनुरूप संशोधित करना जरूरी है।’’

उन्होंने कहा कि एफआरपी अब गन्ना उत्पादन की लागत का 105.2 प्रतिशत है। एफआरपी में वृद्धि ने गन्ने को सबसे अधिक लाभकारी फसल के रूप में अपनी जगह बनाए रखने में मदद की है। हालांकि, प्रसंस्करण उद्योग की वित्तीय व्यवहार्यता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

एआईएसटीए के अनुसार, 2019 से गन्ने के एफआरपी में 29 प्रतिशत (नवीनतम बढ़ोतरी सहित) की वृद्धि की गई है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय करने वाली मिलों को गन्ने की बहुत अधिक लागत वहन करनी पड़ती है।

इसके अतिरिक्त, मजदूरी, रसायन, परिवहन, पैकिंग सामग्री आदि सहित कच्चे माल की लागतों में पिछले छह वर्ष में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। इसलिए वर्तमान लागत के साथ चीनी के एमएसपी का संरेखण सबसे महत्वपूर्ण है।

चीनी व्यापार संगठन ने कहा, ‘‘ ऐसा न करने पर परिचालन लाभहीन हो जाएगा और उद्योग की स्थिति खराब हो सकती है जिससे किसानों, उपभोक्ताओं तथा समग्र अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।’’

एआईएसटीए ने एथनॉल की कीमतों पर इस बात पर जोर दिया कि ‘‘ एथनॉल मूल्य निर्धारण लाभकारी न होने से देश का एथनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम खतरे में आ सकता है, जिससे चीनी मिलों की वित्तीय व्यवहार्यता कमजोर हो सकती है जिन्होंने आसवन क्षमता में भारी निवेश किया है।’’

इससे उद्योग पर बिना बिकी चीनी के भंडार का बोझ बढ़ सकता है, खासकर तब जब सत्र 2025-26 में चीनी उत्पादन स्थिर रहने का अनुमान है।

गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर चीनी की कीमतों में गिरावट देखी गई है।

विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार, जिंस की कीमतों में भारी गिरावट आने वाली है जिससे निर्यात अव्यवहारिक हो जाएगा।

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