देश की खबरें | आरोपी की अनुपस्थिति वाले मामले में एकतरफा निर्णय के लिए एनआई अधिनियम में संशोधन की सलाह

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. कर्नाटक उच्च न्यायालय ने आरोपी की अनुपस्थिति वाले मामलों में एकतरफा निर्णय देने के लिए परक्राम्य लिखत अधिनियम (एनआई एक्ट) में संशोधन किये जाने की सलाह दी है।

बेंगलुरु, एक जून कर्नाटक उच्च न्यायालय ने आरोपी की अनुपस्थिति वाले मामलों में एकतरफा निर्णय देने के लिए परक्राम्य लिखत अधिनियम (एनआई एक्ट) में संशोधन किये जाने की सलाह दी है।

अदालत ने उल्लेख किया है कि दीवानी प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) से संबंधित मामलों के विपरीत दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) या परक्राम्य लिखत अधिनियम के तहत आरोपी की अनुपस्थिति वाले मामलों में एकतरफा निर्णय लेने का कोई प्रावधान नहीं है।

अदालत ने हाल के एक फैसले में कहा, ‘‘विधायिका को दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन या विशेष कानून लाने के बारे में सोचना चाहिए, ताकि आरोपी की अनुपस्थिति में मुकदमे का निर्णय सुनिश्चित किया जा सके। संशोधन, शायद, उन बेईमान तत्वों को रोक सकता है, जो अपने खिलाफ समन या वारंट तामील होने से बचने की युक्ति का सहारा लेते हैं।’’

यह मामला जीएच अब्दुल कादरी नामक व्यक्ति से संबंधित है, जिसे उडुपी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) ने 2018 में परक्राम्य लिखत अधिनियम के तहत छह आपराधिक मामलों में सजा सुनाई थी, क्योंकि उसके खाते में पर्याप्त धनराशि न होने के कारण ऋण के सिलसिले में जारी चेक अमान्य हो गए थे। उडुपी की एक सत्र अदालत ने सजा को बरकरार रखा था।

कादरी ने निचली अदालत के आदेशों को चुनौती देने वाली छह पुनर्विचार याचिकाओं के साथ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उसने तर्क दिया था कि मुकदमे की सुनवाई और निर्णय निर्धारण उनकी अनुपस्थिति में किया गया था।

याचिकाओं पर सुनवाई करने वाले न्यायमूर्ति श्रीनिवास हरीश कुमार ने 24 मई को एक फैसले में कहा कि कादरी को समन नहीं मिला था।

अदालत ने कहा कि निचली अदालत को सामान्य तौर पर वारंट जारी करना चाहिए था और फिर उसकी पेशी सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक घोषणा करनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय, इसने एकतरफा आपराधिक कार्यवाही की।

उच्च न्यायालय ने इसे ‘स्पष्ट त्रुटि’ करार देते हुए कहा कि दीवानी प्रक्रिया संहिता से संबंधित मामलों के विपरीत आरोपी की अनुपस्थिति वाले मामलों के लिए दंड प्रक्रिया संहिता या परक्राम्य लिखत अधिनियम में एकतरफा कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है।

अदालत ने सुझाव दिया कि आरोपी की अनुपस्थिति वाले मामलों को देखने के लिए परक्राम्य लिखत अधिनियम में संशोधन किया जाना चाहिए।

उच्च न्यायालय ने कादरी के मामलों में निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और सभी छह मामलों को नए सिरे से निपटान के लिए उडुपी की मजिस्ट्रेट अदालत में वापस भेज दिया गया।

कादरी को प्रत्येक मामले में शिकायतकर्ता को 2,000 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया गया था।

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