देश की खबरें | अनुच्छेद 370 को निरस्त करना कार्यपालिका का आदेश नहीं था, पूरी संसद को विश्वास में लिया गया था: न्यायालय से कहा गया

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय को शुक्रवार को बताया गया कि तत्कालीन जम्मू कश्मीर राज्य को "विशेष दर्जा" देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने का निर्णय अकेले राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा नहीं लिया गया था और भारतीय संसद को विश्वास में लिया गया था।

नयी दिल्ली, एक सितंबर उच्चतम न्यायालय को शुक्रवार को बताया गया कि तत्कालीन जम्मू कश्मीर राज्य को "विशेष दर्जा" देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने का निर्णय अकेले राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा नहीं लिया गया था और भारतीय संसद को विश्वास में लिया गया था।

इस मुद्दे पर लंबी बहस जारी रहने के बीच, प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की पीठ को हस्तक्षेपकर्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने बताया कि अनुच्छेद 370 में 'सिफारिश' शब्द का मतलब है कि निरस्त करने के लिए जम्मू कश्मीर की संविधान सभा की सहमति आवश्यक नहीं थी।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ‘‘प्रावधान को निरस्त करना कोई कार्यपालिका का निर्णय नहीं था और समग्र संसद को विश्वास में लिया गया था, जिसमें जम्मू कश्मीर के सांसद भी शामिल थे।’’

उन्होंने दोनों संविधान सभाओं के बीच अंतर बताने का प्रयास करते हुए कहा, जम्मू कश्मीर के लिए संविधान बनाते समय, इसकी संविधान सभा को वही स्वतंत्रता नहीं मिली, जो भारत की संविधान सभा को प्राप्त थी।

अनुच्छेद 370(3) का जिक्र करते हुए द्विवेदी ने कहा, ‘‘अनुच्छेद 370(3) के तहत 'सिफारिश' शब्द का मतलब यह नहीं है कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए संविधान सभा की सहमति आवश्यक थी।’’

पीठ में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत भी शामिल थे, जो प्रावधान को निरस्त करने के केंद्र सरकार के 5 अगस्त, 2019 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के 14वें दिन दलीलें सुन रही है। द्विवेदी ने पीठ से कहा कि ‘‘जम्मू कश्मीर संविधान सभा विभिन्न आदेशों से बंधी हुई थी, जिसमें भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधान शामिल हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इसे न्याय, स्वतंत्रता, भाईचारा सुनिश्चित करना था। यह अनुच्छेद 1 से भी बंधा हुआ था। यह घोषित नहीं कर सकता था कि हम भारत की संघीय इकाई नहीं हैं। वे यह नहीं कह सकते थे कि उनके क्षेत्र का कोई भी हिस्सा भारत का हिस्सा नहीं हो सकता है।’’

द्विवेदी ने अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानाओं को निरस्त करने के कदम का बचाव करते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 को हमेशा एक अस्थायी प्रावधान माना जाता था और डॉ. बी आर आंबेडकर, एन.जी. आयंगर (संविधान सभा में), जवाहरलाल नेहरू और गुलज़ारीलाल नंदा के (संसद में) भाषणों में इसका संकेत दिया गया है कि जम्मू कश्मीर राज्य को अन्य राज्यों के बराबर लाने की परिकल्पना शुरुआत से ही की गई थी।

उन्होंने कहा कि इसलिए, अनुच्छेद 370 का उल्लेख भारत के संविधान में अस्थायी के रूप में किया गया था।

द्विवेदी ने कहा, ‘‘निर्माताओं को पता था कि जम्मू कश्मीर के संविधान के निर्माण के बाद संविधान सभा को भंग कर दिया जाएगा, फिर भी उन्होंने यह प्रावधान नहीं किया कि जम्मू कश्मीर संविधान सभा के भंग होने पर राष्ट्रपति की शक्तियां समाप्त हो जाएंगी या निष्क्रिय हो जाएंगी। उन्होंने अनुच्छेद 370 को स्थायी प्रावधान भी घोषित भी नहीं किया...।’’

वरिष्ठ वकील ने कहा कि यह एक अच्छे कारण के लिए किया गया था, क्योंकि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की शक्ति मुख्य रूप से भारत के राष्ट्रपति में निहित थीं, जो राष्ट्र के प्रमुख हैं और उन्हें मंत्रिपरिषद द्वारा सलाह दी जाती है, जो संसद के प्रति जिम्मेदार है।

उन्होंने कहा, ‘‘यह तथ्य कि राष्ट्रपति ने अतीत में कई संवैधानिक आदेश जारी किए हैं और जम्मू कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों के साथ समानता लाये हैं, यह दर्शाता है कि राष्ट्रपति पर भरोसा करना सही था...संवैधानिक प्रथा से पता चलता है कि सभी संबंधित पक्षों ने यह समझा कि राष्ट्रपति की शक्तियां जारी रहेंगी, भले ही जम्मू कश्मीर संविधान सभा का अस्तित्व में नहीं रहे।’’

हस्तक्षेपकर्ता 'ऑल इंडिया कश्मीरी समाज' की ओर से पेश वरिष्ठ वकील वी गिरि ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 370 संविधान निर्माताओं द्वारा एक अस्थायी प्रावधान के रूप में समझा गया था।

सुनवाई अधूरी रही और 4 सितंबर को जारी रहेगी।

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने और जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को 2019 में एक संविधान पीठ को सुनवायी के लिए भेजा गया था। इसके तहत पूर्ववर्ती राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों - जम्मू कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर दिया गया था।

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