देश की खबरें | कोविड-19 महामारी के दौरान कामगारों की मदद के लिये एनजीओ भरपूर सराहना के पात्र हैं : न्यायालय

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नयी दिल्ली, नौ जून उच्चतम न्यायालय ने कोविड-19 महामारी की वजह से पलायन कर रहे कामगारों की हरसंभव मदद के लिये मंगलवार को गैर सरकारी संगठनों की भूरि भूरि सराहना की और कहा कि वैसे तो प्रवासी श्रमिकों की देखभाल सरकार की जिम्मेदारी थी लेकिन इन संगठनों ने इसमें उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।

शीर्ष अदालत ने पलायन कर रहे कामगारों की मदद के लिये आगे आकर अहम भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों की प्रशंसा की ओर कहा कि इन श्रमिकों की परेशानियों से विचलित समाज ने जबर्दस्त समर्पण का परिचय दिया।

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न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम आर शाह ने अपने आदेश में कहा कि वैसे तो पलायन कर रहे इन कामगारों की मदद करने की जिम्मेदारी राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों की थी लेकिन कठिनाई की इस घड़ी में गैर सरकारी संगठनों और व्यक्तियों ने इनकी परेशानियां कम करने में महत्वपूर्ण योगदान किया और इसमें अहम भूमिका अदा की है।

पीठ ने कहा, ‘‘इस महामारी से संघर्ष करने के साथ ही पलायन कर रहे श्रमिकों की मदद करने और उनके लिये अपने पैसों से खाना-पानी और उनके जाने का बंदोबस्त करने के लिये ये गैर सरकारी संगठन भरपूर सराहना के पात्र हैं।’’

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पीठ ने अपने आदेश में कहा कि अब यह आवश्यक है कि राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश अपने अधिकारियों तथा पर्यवेक्षकों के मामले में उचित कार्रवाई करें ताकि कामगारों के लिये तैयार की गयी योजनाओं और कल्याणकारी उपायों का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंच सके।

पलायन कर रहे इन श्रमिकों की दुर्दशा का शीर्ष अदालत ने हालांकि स्वत: संज्ञान लिया था लेकिन कई उच्च न्यायालयों के समक्ष भी यह मामला आया था और उन्होंने इन कामगारों के मामले में कार्यवाही की थी।

पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय सांविधानिक अदालतें हैं और कामगारों के मौलिक अधिकारों के हनन का संज्ञान लेना उनके अधिकार क्षेत्र में था। पीठ ने कहा ‘‘ हमें इसमे कोई संदेह नहीं है कि संबंधित प्राधिकारियों के जवाब सहित सारे पहलुओं पर विचार के बाद उन मामलों में आगे कार्यवाही होगी।’’

शीर्ष अदालत ने इस तथ्य का भी जिक्र किया कि राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश उसके समक्ष यही दावा कर रहे हैं कि वे केन्द्र और संबंधित प्राधिकारियों के आदेशों, दिशा-निर्देशों, नीतियों और निर्णयों का पालन कर रहे थे और आवश्यक कदम उठा रहे थे।

पीठ ने कहा कि नीतियों और मंशा के बारे में किसी प्रकार का अपवाद नहीं हो सकता लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि इन नीतियों और आदेशों पर अमल की जिम्मेदारी जिन्हें सौंपी गयी है, वे प्रभावी और सही तरीके से इन योजनाओं को लागू करें।

न्यायालय ने कहा कि इस मामले में विभिन्न हस्तक्षेपकर्ताओं ने योजनाओं और नीतियों के अमल में खामियों और कमियों का उजागर किया है।

पीठ ने कहा कि राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों की जिम्मेदारी सिर्फ अपनी नीति, उपायों और धन आबंटन का हवाला देने तक नहीं है बल्कि कठोर सतर्कता बरतते हुये यह सुनिश्चित करने की भी है कि क्या इन योजनाओं और उपायों का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है।

न्यायालय ने 28 मई को अपने आदेश में राज्यों ओर केन्द्र शासित प्रदेशों से कहा था कि लॉकडाउन के बाद से अपने पैतृक स्थान जाने के लिये ट्रेन और बस के लिये अपनी बारी का इंतजार कर रहे कामगारों को ‘नि:शुल्क भोजन और पानी’ उपलब्ध करायें ।

अनूप

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