सूरज जैसी शक्ति धरती पर लाने की कोशिश: फ्यूजन ऊर्जा की रेस में जर्मनी

दुनिया भर की कंपनियों के बीच एक बड़ी रेस चल रही है कि कौन सबसे पहले ऐसा न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर बना पाएगा, जो बड़े पैमाने पर बिजली पैदा कर सके.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दुनिया भर की कंपनियों के बीच एक बड़ी रेस चल रही है कि कौन सबसे पहले ऐसा न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर बना पाएगा, जो बड़े पैमाने पर बिजली पैदा कर सके. इस दौड़ में जर्मनी के स्टार्टअप्स भी पीछे नहीं हैं.दुनिया की भूख अब सिर्फ खाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा की खपत भी तेजी से बढ़ रही है. इसकी एक बड़ी वजह तेजी से बदलती दुनिया भी है, जहां अब गाड़ियों से लेकर उद्योगों तक पूरी अर्थव्यवस्था बिजली पर अपनी निर्भरता लगातार बढ़ा रही है. इस खपत को और तेजी से बढ़ा रहे हैं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उसके लिए जरूरी बड़े-बड़े डेटा सेंटर. ऐसे में सबकी नजर परमाणु संलयन पर टिकी है, जिसे ऊर्जा आपूर्ति का भविष्य माना जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि 2050 तक फ्यूजन ऊर्जा का बाजार 350 अरब डॉलर से भी ज्यादा का हो सकता है.

फ्यूजन ऊर्जा में हल्के परमाणुओं के छोटे-छोटे केंद्र यानी नाभिक आपस में जुड़ते हैं और एक नया तत्व बनाते हैं. इस परमाणु संलयन की इस प्रक्रिया में बहुत ज्यादा गर्मी पैदा होने से ऊर्जा बनती है, जिसका इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि यह ऊर्जा जीवाश्म ईंधन या मौसम पर निर्भर नहीं होगी और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन का खतरा भी नहीं होगा. मौजूदा परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में इस्तेमाल होने वाली परमाणु विखंडन (फिशन) तकनीक में परमाणु को तोड़ा जाता है, जबकि फ्यूजन में उन्हें जोड़ा जाता है. फ्यूजन में दुर्घटना का खतरा बहुत कम माना जाता है और इससे रेडियोएक्टिव कचरा भी नहीं बनता है.

फ्यूजन ऊर्जा की दौड़ में चार जर्मन स्टार्टअप कंपनियां

पिछले कई दशकों तक परमाणु संलयन की चर्चा होते ही ध्यान इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर जैसे बड़े-बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स पर जाता था. यूरोपीय संघ के देश, अमेरिका, रूस और चीन समेत दुनिया के 35 देश मिलकर फ्रांस के दक्षिणी हिस्से, सर्न में एक प्रयोग करते हुए फ्यूजन रिएक्टर बना रहे हैं. लेकिन 2007 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट को कई मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा. इसकी लागत उम्मीद से कई गुना ज्यादा बढ़ गई और इसे पूरा करने की तारीख लगातार टलती रही. अब आधिकारिक तौर पर इसके पूरे होने की संभावना 2034 से 2036 के बीच बताई जा रही है.

अब दुनिया भर में कई निजी कंपनियां भी फ्यूजन ऊर्जा की दौड़ में उतर चुकी हैं और अपना खुद का परमाणु संलयन रिएक्टर विकसित करने की कोशिश कर रही हैं.

यूरोपीय संघ की एजेंसी ‘फ्यूजन फॉर एनर्जी' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में करीब 77 कंपनियां फ्यूजन ऊर्जा को व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल करने के लायक बनाने पर काम कर रही हैं. इसमें से 42 कंपनियां अमेरिका में हैं, 8 चीन में और 6 ब्रिटेन में हैं. जर्मनी भी इस होड़ में पीछे नहीं है. यहां फोकस्ड एनर्जी, मार्वेल फ्यूजन, प्रॉक्सिमा फ्यूजन और गाउस फ्यूजन जैसे चार स्टार्टअप फ्यूजन तकनीक को तेजी से विकसित करने में जुटे हैं.

तेजी से बढ़ रहा निवेश

न्यूक्लियर फ्यूजन सिर्फ वैज्ञानिक चुनौती ही नहीं है, बल्कि बेहद महंगा भी है. जर्मनी इस क्षेत्र में दुनिया का अगुवा बनना चाहता है, लेकिन निजी और सरकारी निवेश का बड़ा हिस्सा फिलहाल अमेरिका और चीन की कंपनियों और परियोजनाओं को मिल रहा है.

कंपनियां और निवेशक न्यूक्लियर फ्यूजन को ऊर्जा का भविष्य मान रहे हैं और इसमें तेजी से पैसा लगा रहे हैं. सरकारी फंडिंग को छोड़ दिया जाए तो यूरोपीय संघ की एजेंसी 'फ्यूजन फॉर एनर्जी' के मुताबिक, 2025 के अंत तक निजी कंपनियां फ्यूजन रिसर्च में करीब 13 अरब यूरो का निवेश कर चुकी हैं. रिपोर्ट के अनुसार, जून 2025 से ही इस निवेश में लगभग 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

इस निवेश का सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका को मिला है. वहां कुल निजी निवेश का 53 फीसदी हिस्सा गया. वहीं, करीब एक-तिहाई निवेश चीनी कंपनियों के हिस्से आया. रिपोर्ट के मुताबिक, इन दोनों ही देशों में फ्यूजन टेक्नोलॉजी पर काम करने वाली कुछ कंपनियां अब 'यूनिकॉर्न' बन चुकी हैं यानी उनकी अनुमानित बाजार वैल्यू लगभग एक अरब डॉलर से ज्यादा हो चुकी है.

बाकी का बचा कुचा निवेश यानी सिर्फ लगभग 70 करोड़ यूरो ही यूरोपीय कंपनियों के हिस्से में आया. यह यूरोप की आठ फ्यूजन कंपनियों को मिला और इसका सबसे बड़ा हिस्सा जर्मनी की दो स्टार्टअप, मार्वेल फ्यूजन और फोकस्ड एनर्जी को मिला.

गैर-यूरोपीय देशों की धाक से चिंता

यह असमानता सिर्फ फ्यूजन ऊर्जा तक ही सीमित नहीं है. सोलर पैनल, पवन ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, अंतरिक्ष तकनीक, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे कई क्षेत्रों में भी अमेरिका और चीन अक्सर सबसे आगे दिखाई देते हैं. इसकी बड़ी वजह इन देशों का भारी निवेश और मजबूत सरकारी समर्थन है.

चीन की सरकार न्यूक्लियर फ्यूजन पर भारी निवेश कर रही है. वहीं अमेरिका में इस क्षेत्र को बड़ी टेक कंपनियों और निजी निवेशकों का मजबूत समर्थन मिल रहा है. पिछले दस साल में गूगल, अमेरिकी कंपनी टीएई टेक्नोलॉजीज में सैकड़ों करोड़ डॉलर का निवेश कर चुका है. इतना ही नहीं, गूगल के इंजीनियर भी टीएई टेक्नोलॉजीज के साथ मिलकर फ्यूजन तकनीक विकसित करने पर काम कर रहे हैं.

गूगल ने अमेरिका की सबसे बड़ी फ्यूजन कंपनी कॉमनवेल्थ फ्यूजन सिस्टम में भी निवेश किया है. इतना ही नहीं कंपनी ने भविष्य में उससे बिजली खरीदने का समझौता भी किया है. वहीं, अमेरिकी कंपनी हेलियन एनर्जी को ओपन एआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन का समर्थन हासिल है. माइक्रोसॉफ्ट ने भी हेलियन एनर्जी के साथ भविष्य में बिजली खरीदने का करार किया है.

फ्यूजन की दौड़ में जर्मनी की ताकत

2021 में शुरू हुए स्टार्टअप फोकस्ड एनर्जी के सह-संस्थापक और तकनीकी यूनिवर्सिटी टीयू डार्मश्टाट के प्रोफेसर मार्कुस रोथ कहते हैं कि यह खतरा जरूर है कि जर्मन कंपनियां फ्यूजन ऊर्जा की दौड़ में पीछे छूट सकती हैं. लेकिन इसके बावजूद रोथ कहते हैं, "भले ही दूसरे देश इस क्षेत्र में ज्यादा पैसा लगा रहे हैं, लेकिन जर्मनी के पास एक मजबूत आधार मौजूद है.” रोथ के मुताबिक, इस मजबूत आधार यानी बेहतरीन रिसर्च संस्थान, स्टार्टअप्स और बड़ी औद्योगिक कंपनियों की वजह से जर्मन कंपनियां कम निवेश के बावजूद तेजी से आगे बढ़ सकती हैं.

ज्यादातर फ्यूजन कंपनियों से अलग फोकस्ड एनर्जी लेजर आधारित फ्यूजन तकनीक पर काम कर रही है. इस तकनीक की क्षमता 2022 में तब सामने आई जब अमेरिका के नेशनल इग्निशन फैसिलिटी के वैज्ञानिकों ने पहली बार 'इग्निशन' हासिल किया. इस फ्यूजन प्रक्रिया से इतनी ऊर्जा पैदा हुई जो लक्षित ऊर्जा से भी कई ज्यादा थी.

इस सफलता के बाद जर्मनी की ऊर्जा कंपनी आरडब्ल्यूई भी न्यूक्लियर फ्यूजन के क्षेत्र में उतर आई. मई 2026 में आरडब्ल्यूई ने फोकस्ड एनर्जी में 6 करोड़ यूरो का निवेश किया. इसके अलावा जर्मनी में आरडब्ल्यूई ने पुराने परमाणु ऊर्जा संयंत्र की जगह पर अब एक फ्यूजन पावर प्लांट का प्रोटोटाइप बनाने की योजना बनाई है.

मार्कुस रोथ मानते हैं कि फ्यूजन रिएक्टर बनाने की राह में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, जरूरी सप्लाई चेन को जल्दी तैयार करना. हालांकि, जर्मनी की ऑप्टिक्स इंडस्ट्री दुनिया भर में काफी मजबूत मानी जाती है, लेकिन अभी भी काफी काम बाकी है. रोथ के मुताबिक, "जर्मनी को ऐसे लेजर सिस्टम बनाना सीखना होगा जैसे यहां कारें बनाई जाती हैं यानी बेहद सटीक तकनीक के साथ असेंबली लाइन पर तैयार.” अगर ऐसा हो पाया तो जर्मनी की ऑप्टिक्स इंडस्ट्री देश की अर्थव्यवस्था का एक मजबूत आधार बन सकती है.

2040 में तक तैयार हो जाएगा पहला फ्यूजन रिएक्टर?

जर्मनी की संघीय सरकार भी न्यूक्लियर फ्यूजन को भविष्य की एक बेहद महत्वपूर्ण तकनीक मान रही है. जुलाई 2025 में जारी ‘हाई-टेक एजेंडा फॉर जर्मनी' में फ्यूजन ऊर्जा को देश के भविष्य की छह प्रमुख तकनीकों में शामिल किया गया था. इसके अलावा, मौजूदा सरकार के कार्यकाल में न्यूक्लियर फ्यूजन के लिए लगभग दो अरब यूरो से ज्यादा के सरकारी निवेश का वादा किया गया है.

हालांकि, फ्यूजन ऊर्जा से वास्तव में बिजली बनाने में अभी भी काफी समय है. फोकस्ड एनर्जी 2037 तक एक व्यावसायिक फ्यूजन रिएक्टर का प्रोटोटाइप बनाने की योजना बना रही है. मार्कुस रोथ कहते हैं, "इसके बाद 2040 के शुरुआती सालों में दुनिया का पहला व्यावसायिक फ्यूजन पावर प्लांट बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है.”

लेकिन तब तक इस तकनीक के विकास पर बहुत ज्यादा निवेश की जरूरत है. रोथ बताते हैं कि फिलहाल फोकस्ड एनर्जी को हर साल करीब 15 से 20 करोड़ यूरो की जरूरत है. हालांकि, आने वाले समय में यह खर्च और बढ़ सकता है. उनके मुताबिक, "प्रयोग वाला पहला फ्यूजन पावर प्लांट बनाने में भी कई अरब यूरो लग सकते हैं. रोथ का कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना "सरकारी मदद के बिना संभव नहीं है.”

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